महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः
जनकवंशी वसुमान्को एक मुनिका धर्मविषयक उपदेश
भीष्म उवाच
मृगयां विचरन् कश्चिद् विजने जनकात्मजः ।
वने ददर्श विप्रेन्द्रमृषिं वंशधरं भृगोः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! एक समयकी बात है, जनकवंशका कोई राजकुमार शिकार खेलनेके लिये एक निर्जन वनमें घूम रहा था। उसने वनमें बैठे हुए एक मुनिको देखा; जो ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ एवं महर्षि भृगुके वंशधर थे ॥ १ ॥
उपासीनमुपासीनः प्रणम्य शिरसा मुनिम् ।
पश्चादनुमतस्तेन पप्रच्छ वसुमानिदम् ॥ २ ॥
पास ही बैठे हुए मुनिको मस्तक झुकाकर प्रणाम करके वह राजकुमार उनके समीपमें ही बैठ गया। उसका नाम वसुमान् था। उसने महर्षिकी आज्ञा लेकर उनसे इस प्रकार पूछा — ॥ २ ॥
भगवन् किमिदं श्रेयः प्रेत्य चापीह वा भवेत् ।
पुरुषस्याध्रुवे देहे कामस्य वशवर्तिनः ॥ ३ ॥
‘भगवन्! इस क्षणभंगुर शरीरमें कामके अधीन होकर रहनेवाले पुरुषका इस लोक और परलोकमें किस उपायसे कल्याण हो सकता है? ॥ ३ ॥
सत्कृत्य परिपृष्टः सन् सुमहात्मा महातपाः ।
निजगाद ततस्तस्मै श्रेयस्करमिदं वचः ॥ ४ ॥
सत्कारपूर्वक प्रश्न करनेपर उन महातपस्वी महात्मा मुनिने राजकुमार वसुमान्से यह कल्याणकारी वचन कहा ॥ ४ ॥
ऋषिरुवाच
मनसोऽप्रतिकूलानि प्रेत्य चेह च वाञ्छसि ।
भूतानां प्रतिकूलेभ्यो निवर्तस्व यतेन्द्रियः ॥ ५ ॥
ऋषि बोले—राजकुमार! यदि तुम इस लोक और परलोकमें अपने मनके अनुकूल वस्तुएँ पाना चाहते हो तो अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर समस्त प्राणियोंके प्रतिकूल आचरणोंसे दूर हट जाओ ॥ ५ ॥
धर्मः सतां हितः पुंसां धर्मश्चैवाश्रयः सताम् ।
धर्माल्लोकास्त्रयस्तात प्रवृत्ताः सचराचराः ॥ ६ ॥