भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 206

द्विजातिभ्योऽनुरूपेभ्यः कामांश्च विविधान् बहून्। यस्यादेशेन तद् वित्तं व्यभजन्त द्विजातयः॥ १३४ ॥ ‘राजाने सोनेके खंभोंसे युक्त पूर्णतः सोनेका बना हुआ महल, जो कमलके समान नेत्रोंवाली सुन्दरी स्त्रियोंकी शय्याओंसे सुशोभित था, तैयार कराकर योग्य ब्राह्मणोंको दान किया। साथ ही नाना प्रकारकी भोगसामग्रियाँ भी प्रचुरमात्रामें उन्हें दी थीं। उनके आदेशसे ब्राह्मणोंने उनका सारा धन आपसमें बाँट लिया था॥ १३३-१३४॥

खानयामास यः कोपात् पृथिवीं सागराङ्किताम्। यस्य नाम्ना समुद्रश्च सागरत्वमुपागतः॥ १३५ ॥ ‘एक समय क्रोधमें आकर उन्होंने समुद्रसे चिह्नित सारी पृथ्वी खुदवा डाली थी। उन्हींके नामपर समुद्रकी ‘सागर' संज्ञा हो गयी॥ १३५॥

स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया। पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः॥ १३६ ॥ ‘सृंजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े हुए थे। तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो॥ १३६॥

राजानं च पृथुं वैन्यं मृतं शुश्रुम संजय। यमभ्यषिञ्चन् सम्भूय महारण्ये महर्षयः॥ १३७ ॥ ‘सृंजय! वेनके पुत्र महाराज पृथुको भी अपने शरीरका त्याग करना पड़ा था, ऐसा हमने सुना है। महर्षियोंने महान् वनमें एकत्र होकर उनका राज्याभिषेक किया था॥ १३७॥

प्रथयिष्यति वै लोकान् पृथुरित्येव शब्दितः। क्षताद् यो वै त्रायतीति स तस्मात् क्षत्रियः स्मृतः॥ १३८ ॥ ‘ऋषियोंने यह सोचकर कि सब लोकोंमें धर्मकी मर्यादा प्रथित (स्थापित) करेंगे, उनका नाम पृथु रखा था। वे क्षत अर्थात् दुःखसे सबका त्राण करते थे, इसलिये क्षत्रिय कहलाये॥ १३८॥

पृथुं वैन्यं प्रजा दृष्ट्वा रक्ताः स्मेति यदब्रुवन्। ततो राजेति नामास्य अनुरागादजायत॥ १३९ ॥ ‘वेननन्दन पृथुको देखकर समस्त प्रजाओंने एक साथ कहा कि 'हम इनमें अनुरक्त हैं' इस प्रकार प्रजाका रञ्जन करनेके कारण ही उनका नाम ‘राजा' हुआ॥ १३९॥

अकृष्टपच्या पृथिवी पुटके पुटके मधु। सर्वा द्रोणदुघा गावो वैन्यस्यासन् प्रशासतः॥ १४० ॥ ‘पृथुके शासनकालमें पृथिवी बिना जोते ही धान्य उत्पन्न करती थी, वृक्षोंके पुट-पुटमें मधु (रस) भरा था और सारी गौएँ एक-एक द्रोण दूध देती थीं॥ १४०॥