भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः

सात्त्विक, राजस और तामस प्रकृतिके मनुष्योंकी गतिका वर्णन तथा राजा जनकके प्रश्न

याज्ञवल्क्य उवाच

एते प्रधानस्य गुणास्त्रयः पुरुषसत्तम ।
कृत्स्नस्य चैव जगतस्तिष्ठन्त्यनपगाः सदा ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— पुरुषप्रवर! सत्त्व, रज और तम—ये तीन प्रकृतिके गुण हैं, जो सम्पूर्ण जगत्में सदा विद्यमान रहते हैं। कभी उससे अलग नहीं होते हैं ॥ १ ॥

अव्यक्तरूपो भगवान् शतधा च सहस्रधा ।
शतधा सहस्रधा चैव तथा शतसहस्रधा ॥ २ ॥
कोटिशश्च करोत्येष प्रत्यगात्मानमात्मना ।
यह ऐश्वर्यशालिनी प्रकृति अपने ही प्रभावसे जीवको सैकड़ों, हजारों, लाखों और करोड़ों रूपोंमें प्रकट कर देती है ॥ २ १/२ ॥

सात्त्विकस्योत्तमं स्थानं राजसस्येह मध्यमम् ॥ ३ ॥
तामसस्याधमं स्थानं प्राहुरध्यात्मचिन्तकाः ।
अध्यात्म-शास्त्रका चिन्तन करनेवाले विद्वान् कहते हैं कि सात्त्विक पुरुषको उत्तम, रजोगुणीको मध्यम और तमोगुणीको अधम स्थानकी प्राप्ति होती है ॥ ३ १/२ ॥

केवलेनेह पुण्येन गतिमूर्ध्वमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥
पुण्यपापेन मानुष्यमधर्मेणाप्यधोगतिम् ।
केवल पुण्य करनेसे मनुष्य ऊर्ध्वलोकमें गमन करता है, पुण्य और पाप दोनोंके अनुष्ठानसे मर्त्यलोकमें जन्म लेता है तथा केवल पापाचार करनेपर उसे अधोगतिमें गिरना पड़ता है ॥ ४ १/२ ॥

द्वन्द्वमेषां त्रयाणां तु संनिपातं च तत्त्वतः ॥ ५ ॥
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च शृणुष्व मे ।
अब मैं सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके द्वन्द्व^१ और संनिपात^२ का यथार्थरूपसे वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ ५ १/२ ॥

सत्त्वस्य तु रजो दृष्टं रजसश्च तमस्तथा ॥ ६ ॥
तमसश्च तथा सत्त्वं सत्त्वस्याव्यक्तमेव च ।
अव्यक्तः सत्त्वसंयुक्तो देवलोकमवाप्नुयात् ॥ ७ ॥