महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2077, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुखपूर्वक विचरण करता है ।। ६ ।। वेदेषु चाष्टगुणिनं योगमाहुर्मनीषिणः । सूक्ष्ममष्टगुणं प्राहुर्नेतरं नृपसत्तम ।। ७ ।। नृपश्रेष्ठ! मनीषी पुरुषोंका कहना है कि वेदमें स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकारके योगोंका वर्णन है। उनमें स्थूल योग अणिमा आदि आठ प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है और सूक्ष्म योग ही (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—इन आठ गुणों (अंगों) से युक्त है; दूसरा नहीं ।। ७ ।। द्विगुणं योगकृत्यं तु योगानां प्राहुरुत्तमम् । सगुणं निर्गुणं चैव यथा शास्त्रनिदर्शनम् ।। ८ ।। योगका मुख्य साधन दो प्रकारका बताया गया है—सगुण और निर्गुण (सबीज और निर्बीज)। ऐसा ही शास्त्रोंका निर्णय है ।। ८ ।। धारणं चैव मनसः प्राणायामश्च पार्थिव । एकाग्रता च मनसः प्राणायामस्तथैव च ।। ९ ।। पृथ्वीनाथ! किसी विशेष देशमें चित्तको स्थापित करनेका नाम 'धारणा' है। मनकी धारणाके साथ किया जानेवाला प्राणायाम सगुण है और देश-विशेषका आश्रय न लेकर मनको निर्बीज समाधिमें एकाग्र करना निर्गुण प्राणायाम कहलाता है ।। ९ ।। प्राणायामो हि सगुणो निर्गुणं धारयेन्मनः । यद्यदृश्यति मुञ्चन् वै प्राणान् मैथिलसत्तम । वाताधिक्यं भवत्येव तस्मात् तं न समाचरेत् ।। १० ।। सगुण प्राणायाम मनको निर्गुण अर्थात् वृत्तिशून्य करके स्थिर करनेमें सहायक होता है। मैथिलशिरोमणे! यदि पूरक आदिके समय नियत देवता आदिका ध्यानद्वारा साक्षात्कार किये बिना ही कोई प्राणवायुका रेचन करता है तो उसके शरीरमें वायुका प्रकोप बढ़ जाता है; अतः ध्यान-रहित प्राणायामको नहीं करना चाहिये ।। १० ।। निशायाः प्रथमे यामे चोदना द्वादश स्मृताः । मध्ये स्वप्यात् परे यामे द्वादशैव तु चोदनाः ।। ११ ।। रातके पहले पहरमें वायुको धारण करनेकी बारह प्रेरणाएँ बतायी गयी हैं। मध्य रात्रिमें रात्रिके बिचले दो पहरोंमें सोना चाहिये तथा पुनः अन्तिम प्रहरमें बारह प्रेरणाओंका ही अभ्यास करना चाहिये* ।। ११ ।। तदेवमुपशान्तेन दान्तेनैकान्तशीलिना । आत्मारामेण बुद्धेन योक्तव्योऽऽत्मा न संशयः ।। १२ ।। इस प्रकार प्राणायामके द्वारा मनको वशमें करके शान्त और जितेन्द्रिय हो एकान्तवास करनेवाले आत्माराम ज्ञानीको चाहिये कि मनको परमात्मामें लगावे। इसमें संशय नहीं है ।। १२ ।।