भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2111, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2111

श्रावितस्त्रिविधं मोक्षं न च राज्याद्धि चालितः ॥ २७ ॥
वे सांख्यशास्त्रके प्रमुख विद्वान् हैं और सारा सिद्धान्त उन्हें यथावत् रूपसे प्रत्यक्षकी भाँति ठीक-ठीक ज्ञात है। उन्होंने मुझे त्रिविध मोक्षधर्म श्रवण कराया है, परंतु राज्यसे दूर हटनेकी आज्ञा नहीं दी है ॥ २७ ॥
सोऽहं तामखिलां वृत्तिं त्रिविधां मोक्षसंहिताम् ।
मुक्तरागश्चराम्येकः पदे परमके स्थितः ॥ २८ ॥
इस प्रकार उपदेश पाकर मैं विषयोंकी आसक्तिसे रहित हो मुक्तिविषयक तीन प्रकारकी समस्त वृत्तियोंका आचरण करता हूँ और अकेला ही परमपदमें स्थित हूँ ॥
वैराग्यं पुनरेतस्य मोक्षस्य परमो विधिः ।
ज्ञानादेव च वैराग्यं जायते येन मुच्यते ॥ २९ ॥
वैराग्य ही इस मुक्तिका प्रधान कारण है और ज्ञानसे ही वह वैराग्य प्राप्त होता है, जिससे मनुष्य मुक्त हो जाता है ॥ २९ ॥
ज्ञानेन कुरुते यत्नं यत्नेन प्राप्यते महत् ।
महद् द्वन्द्वप्रमोक्षाय सा सिद्धिर्या वयोऽतिगा ॥ ३० ॥
मनुष्य ज्ञानके द्वारा मुक्ति पानेके लिये यत्न करता है। उस यत्नसे महान् आत्मज्ञानकी प्राप्ति होती है। वह महान् आत्मज्ञान ही सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे छुटकारा दिलानेका साधन है, वही सिद्धि है, जो काल (मृत्यु)-को भी लाँघ जानेवाली है ॥ ३० ॥
सेयं परमिका बुद्धेः प्राप्ता निर्द्वन्द्वता मया ।
इहैव गतमोहेन चरता मुक्तसङ्गिना ॥ ३१ ॥
मेरा मोह दूर हो गया है। मैं समस्त संसर्गोंका त्याग कर चुका हूँ; इसलिये मैंने इस गृहस्थधर्ममें रहते हुए ही बुद्धिकी परम निर्द्वन्द्वता प्राप्त कर ली है ॥ ३१ ॥
यथा क्षेत्रं मृदूभूतमद्भिराप्लावितं तथा ।
जनयत्यङ्कुरं कर्म नृणां तद्वत् पुनर्भवम् ॥ ३२ ॥
जैसे जिस खेतको जोतकर खूब मुलायम बना दिया गया हो और यथासमय उसे पानीसे सींचा गया हो, वही बोये हुए बीजमें अंकुर उत्पन्न करता है, उसी प्रकार मनुष्योंका शुभ-अशुभ कर्म ही पुनर्जन्मका उत्पादन करता है ॥ ३२ ॥
यथा चोत्तापितं बीजं कपाले यत्र तत्र वा ।
प्राप्याप्यङ्कुरहेतुत्वमबीजत्वान्न जायते ॥ ३३ ॥
तद्वद् भगवनानेन शिखा प्रोक्तेन भिक्षुणा ।
ज्ञानं कृतमबीजं मे विषयेषु न जायते ॥ ३४ ॥
जैसे मिट्टीके खपरेमें या और किसी भी बर्तनमें भूना गया बीज बीज न रह जानेके कारण अंकुर उगाने योग्य खेतमें पड़कर भी नहीं जमता है, उसी प्रकार मेरे संन्यासी गुरु

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