महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2115, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुकुमारता, सौन्दर्य, मनोहर शरीर तथा यौवनावस्था—ये सारी वस्तुएँ योगके विरुद्ध हैं; फिर भी आपमें इन सब गुणोंके साथ-साथ योग और नियम भी हैं ही, यह कैसे सम्भव हुआ? यही मेरे मनमें संदेह है ।। ५४ ।। यच्चाप्यननुरूपं ते लिङ्गस्यास्य विचेष्टितम् । मुक्तोऽयं स्यान्न वेति स्याद् धर्षितो मत्परिग्रहः ।। ५५ ।। यह जो त्रिदण्डधारणरूप चिह्न है, उसके अनुरूप आपकी कोई चेष्टा नहीं है। यह मुक्त है या नहीं, इसकी परीक्षा लेनेके लिये आपने मेरे शरीरको अभिभूत कर दिया है—उसपर बलात् अधिकार जमा लिया है ।। ५५ ।। न च कामसमायुक्ते युक्तेऽप्यस्ति त्रिदण्डके । न रक्ष्यते त्वया चेदं न मुक्तस्यास्ति गोपना ।। ५६ ।। मनुष्य योगयुक्त होकर भी यदि कामभोगमें आसक्त हो जाय तो उसका त्रिदण्ड धारण करना अनुचित एवं व्यर्थ है। आप अपने इस बर्तावद्वारा संन्यास-आश्रमके नियमकी रक्षा नहीं कर रही हैं। यदि अपने स्वरूपको छिपानेके लिये आपने ऐसा किया हो तो जीवन्मुक्त पुरुषके लिये आत्मगोपन आवश्यक नहीं है ।। ५६ ।। मत्यक्षसंश्रयाच्चायं शृणु यस्ते व्यतिक्रमः । आश्रयन्त्याः स्वभावेन मम पूर्वपरिग्रहम् ।। ५७ ।। आपने स्वभावतः सोच-समझकर मेरे पूर्व-शरीरका आश्रय लेनेकी चेष्टा की है, अतः मेरे पक्षका आश्रय लेने—मेरे शरीरमें प्रवेश करनेके कारण आपसे जो व्यतिक्रम बन गया है, उसे बताता हूँ, सुनिये ।। ५७ ।। प्रवेशस्ते कृतः केन मम राष्ट्रे पुरेऽपि वा । कस्य वा संनिकर्षात् त्वं प्रविष्टा हृदयं मम ।। ५८ ।। आपने किस कारणसे मेरे राज्य अथवा नगरमें प्रवेश किया है अथवा किसके संकेतसे आप मेरे हृदयमें घुस आयी हैं? ।। ५८ ।। वर्णप्रवरमुख्यासि ब्राह्मणी क्षत्रियस्त्वहम् । नावयोरेकयोगोऽस्ति मा कृथा वर्णसंकरम् ।। ५९ ।। वर्णोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी जो कन्याएँ हैं, उन सबमें आप प्रमुख हैं। आप ब्राह्मणी हैं और मैं क्षत्रिय हूँ; अतः हम दोनोंका एकत्र संयोग होना कदापि उचित नहीं है; इसलिये आप वर्णसंकर नामक दोषका उत्पादन न कीजिये ।। ५९ ।। वर्तसे मोक्षधर्मेण त्वं गार्हस्थ्येऽहमाश्रमे । अयं चापि सुकष्टस्ते द्वितीयोऽऽश्रमसंकरः ।। ६० ।। आप मोक्षधर्म (संन्यास-आश्रम)-के अनुसार बर्ताव करती हैं और मैं गृहस्थ-आश्रममें स्थित हूँ; अतः आपके द्वारा यह दूसरा आश्रमसंकर नामक दोषका उत्पादन किया जा रहा है, जो अत्यन्त कष्टप्रद है ।।