महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं है? किससे उत्पन्न हुआ है और किससे नहीं हुआ है? प्राणियोंका अपने अंगोंके साथ भी यहाँ क्या सम्बन्ध है?' अर्थात् कुछ भी सम्बन्ध नहीं है ।। १२४-१२५ ।। यथाऽऽदित्यान्मणेर्वापि वीरुद्भ्यश्चैव पावकः। जायन्त्येवं समुदायात् कलानामिव जन्तवः ।। १२६ ।। जैसे सूर्यकी किरणोंका सम्पर्क पाकर सूर्यकान्त-मणिसे आग प्रकट हो जाती है, परस्पर रगड़ खानेपर काठसे अग्निका प्रादुर्भाव हो जाता है, इसी प्रकार पूर्वोक्त कलाओंके समुदायसे जीव जन्म ग्रहण करते हैं ।। १२६ ।। आत्मन्येवात्मनाऽऽत्मानं यथा त्वमनुपश्यसि । एवमेवात्मनाऽऽत्मानमन्यस्मिन् किं न पश्यसि ।। १२७ ।। जैसे आप स्वयं अपने द्वारा अपनेहीमें आत्माका दर्शन करते हैं, उसी प्रकार अपने द्वारा दूसरोंमें आत्माका दर्शन क्यों नहीं करते हैं? ।। १२७ ।। यद्यात्मनि परस्मिंश्च समतामध्यवस्यसि । अथ मां कासि कस्येति किमर्थमनुपृच्छसि ।। १२८ ।। यदि आप अपनेमें और दूसरेमें भी समभाव रखते हैं तो मुझसे बारंबार क्यों पूछते हैं कि 'आप कौन हैं और किसकी हैं?' ।। १२८ ।। इदं मे स्यादिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य मैथिल । कासि कस्य कुतो वेति वचनैः किं प्रयोजनम् ।। १२९ ।। मिथिलानरेश! 'यह मुझे प्राप्त हो जाय, यह न हो।' इत्यादि रूपसे जो द्वन्द्वविषयक चिन्ता प्राप्त होती है, उससे यदि आप मुक्त हैं तो 'आप कौन हैं? किसकी हैं? अथवा कहाँसे आयी हैं?' इन वचनोंद्वारा प्रश्न करनेसे आपका क्या प्रयोजन है? ।। १२९ ।। रिपौ मित्रेऽथ मध्यस्थे विजये संधिविग्रहे । कृतवान् यो महीपालः किं तस्मिन् मुक्तलक्षणम् ।। १३० ।। शत्रु-मित्र और मध्यस्थके विषयमें, विजय, संधि और विग्रहके अवसरोंपर जिस भूपालने यथोचित कार्य किये हैं, उसमें जीवन्मुक्तका क्या लक्षण है? ।। १३० ।। त्रिवर्गं सप्तधा व्यक्तं यो न वेदेह कर्मसु । सङ्गवान् यस्त्रिवर्गेण किं तस्मिन् मुक्तलक्षणम् ।। १३१ ।। धर्म, अर्थ और कामको त्रिवर्ग कहते हैं। यह सात रूपोंमें अभिव्यक्त होता है। जो कर्मोंमें इस त्रिवर्गको नहीं जानता तथा जो सदा त्रिवर्गसे सम्बन्ध रखता है, ऐसे पुरुषमें जीवन्मुक्तका क्या लक्षण है? ।। १३१ ।। प्रिये वाप्यप्रिये वापि दुर्बले बलवत्यपि । यस्य नास्ति समं चक्षुः किं तस्मिन् मुक्तलक्षणम् ।। १३२ ।। प्रिय अथवा अप्रियमें, दुर्बल अथवा बलवान्में जिसकी समदृष्टि नहीं है, उसमें मुक्तका क्या लक्षण है? ।।