महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2128, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राज्ञान् शूरांस्तथैवाढ्यानेकस्थानपि शङ्कते । भयमप्यभये राज्ञो यैश्च नित्यमुपास्यते ॥ १४७ ॥ विद्वानों, शूरवीरों तथा धनियोंको भी जब वह एक स्थानपर जुटा हुआ देख लेता है, तब उसके मनमें उनके प्रति शंका उत्पन्न हो जाती है। जहाँ भयका कोई कारण नहीं है, वहाँ भी राजाको भय होता है। जो लोग सदा उसके पास उठते-बैठते या सेवामें रहते हैं, उनसे भी वह सशंक बना रहता है ॥ १४७ ॥
तथा चैते प्रदुष्यन्ति राजन् ये कीर्तिता मया । तथैवास्य भयं तेभ्यो जायते पश्य यादृशम् ॥ १४८ ॥ राजन्! मैंने जिनका नाम लिया है, वे विद्वान् और शूरवीर आदि अपने प्रति राजाकी आशंका देखकर सचमुच ही उसके प्रति दुर्भाव रखने लगते हैं और फिर उनसे राजाको जैसा भय प्राप्त होता है, उसको आप स्वयं ही समझ लें ॥ १४८ ॥
सर्वः स्वे स्वे गृहे राजा सर्वः स्वे स्वे गृहे गृही । निग्रहानुग्रहान् कुर्वंस्तुल्यो जनक राजभिः ॥ १४९ ॥ जनक! सब लोग अपने-अपने घरमें राजा हैं और सभी अपने-अपने घरमें गृहस्वामी हैं, सभी किसीको दण्ड देते और किसीपर अनुग्रह करते हैं; अतः वे सब लोग राजाओंके समान ही हैं ॥ १४९ ॥
पुत्रा दारास्तथैवात्मा कोशो मित्राणि संचयाः । परैः साधारणा ह्येते तैस्तैरेवास्य हेतुभिः ॥ १५० ॥ स्त्री, पुत्र, शरीर, कोष, मित्र तथा संग्रह—ये सब वस्तुएँ राजाओंकी भाँति दूसरोंके पास भी साधारणतया रहते ही हैं। जिन कारणोंसे वह राजा कहलाता है, उन्हीं युक्तियोंसे दूसरे लोग भी उसके समान ही कहे जा सकते हैं ॥ १५० ॥
हतो देशः पुरं दग्धं प्रधानः कुञ्जरो मृतः । लोकसाधारणेष्fragment: लोकसाधारणेष् + वे + षु -> लोकसाधारणेष्वेषु मिथ्याज्ञानेन तप्यते ॥ १५१ ॥ ‘हाय! देश नष्ट हो गया, सारा नगर आगसे जल गया और वह प्रधान हाथी मर गया।’ यद्यपि ये सब बातें सब लोगोंके लिये साधारण हैं—सबपर समान रूपसे ये कष्ट प्राप्त होते हैं तथापि राजा अपने मिथ्याज्ञानके कारण केवल अपनी ही हानि समझकर संतप्त होता रहता है ॥ १५१ ॥
अमुक्तो मानसैर्दुःखैरिच्छाद्वेषभयोद्भवैः । शिरोरोगादिभी रोगैस्तथैवाभिनियन्तृभिः ॥ १५२ ॥ इच्छा, द्वेष और भयजनित मानसिक दुःख राजाको कभी नहीं छोड़ते हैं। सिरदर्द आदि शारीरिक रोग भी उसे सब ओरसे नियन्त्रणमें रखकर व्याकुल किये रहते हैं ॥ १५२ ॥
द्वन्द्वैस्तैस्तैस्त्वपहतः सर्वतः परिशङ्कितः ।