महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2166, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपितुर्नियोगमादाय जगाम मिथिलां नृप । प्रष्टुं धर्मस्य निष्ठां वै मोक्षस्य च परायणम् ॥ ७ ॥ नरेश्वर! पिताकी आज्ञा पाकर शुकदेवजी धर्मकी निष्ठा और मोक्षका परम आश्रय पूछनेके लिये मिथिलाकी ओर चल दिये ॥ ७ ॥
उक्तश्च मानुषेण त्वं पथा गच्छेत्यविस्मितः । न प्रभावेण गन्तव्यमन्तरिक्षचरेण वै ॥ ८ ॥ जाते समय व्यासजीने फिर बिना किसी विस्मयके कहा—'बेटा! जिस मार्गसे साधारण मनुष्य चलते हों, उसीसे तुम भी जाना। अपनी योगशक्तिका आश्रय लेकर आकाशमार्गसे कदापि यात्रा न करना ॥ ८ ॥
आर्जवेणैव गन्तव्यं न सुखान्वेषिणा तथा । नान्वेष्टव्या विशेषास्तु विशेषा हि प्रसङ्गिनः ॥ ९ ॥ 'सरलभावसे ही यात्रा करनी चाहिये। रास्तेमें सुख और सुविधाकी खोज नहीं करनी चाहिये। विशेष-विशेष व्यक्तियों अथवा स्थानोंका अनुसंधान न करना; क्योंकि इससे उनके प्रति आसक्ति हो जाती है ॥ ९ ॥
अहंकारो न कर्तव्यो याज्ये तस्मिन् नराधिपे । स्थातव्यं च वशे तस्य स ते छेत्स्यति संशयम् ॥ १० ॥ 'राजा जनक मेरे यजमान हैं, ऐसा समझकर उनके प्रति अहंकार न प्रकट करना तथा सब प्रकारसे उनकी आज्ञाके अधीन रहना। वे तुम्हारी सब शंकाओंका समाधान कर देंगे ॥ १० ॥
स धर्मकुशलो राजा मोक्षशास्त्रविशारदः । याज्यो मम स यद् ब्रूयात् तत् कार्यमविशङ्कया ॥ ११ ॥ 'मेरे यजमान राजा जनक धर्मनिपुण तथा मोक्ष-शास्त्रमें प्रवीण हैं। वे तुम्हें जो आज्ञा दें, उसीका निःशंक होकर पालन करना' ॥ ११ ॥
एवमुक्तः स धर्मात्मा जगाम मिथिलां मुनिः । पद्भ्यां शक्तोऽन्तरिक्षेण क्रान्तुं पृथ्वीं ससागराम् ॥ १२ ॥ पिताके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा मुनि शुकदेवजी मिथिलाकी ओर चल दिये। यद्यपि वे आकाशमार्गसे सारी पृथ्वीको लाँघ जानेमें समर्थ थे, तो भी पैदल ही चले ॥ १२ ॥
स गिरींश्चाप्यतिक्रम्य नदीतीर्थसरांसि च । बहुव्यालमृगाकीर्णा ह्यटवीश्च वनानि च ॥ १३ ॥ मेरोर्हरिश्च द्वे वर्षे वर्षं हैमवतं ततः । क्रमेणैवं व्यतिक्रम्य भारतं वर्षमासदत् ॥ १४ ॥ मार्गमें उन्हें अनेक पर्वत, नदी, तीर्थ और सरोवर पार करने पड़े। बहुत-से सर्पों और वन्य पशुओंसे भरे हुए कितने ही जंगलोंमें होकर जाना पड़ा। उन सबको लाँघकर क्रमशः