भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2170

पाद्यादीनि प्रतिग्राह्य पूजया परयार्चयन् ।। ३६ ।।
कालोपपन्नेन तदा स्वाद्वन्नेनाभ्यतर्पयन् ।
उन्होंने पाद्य, अर्घ्य आदि निवेदन करके उत्तम विधिसे शुकदेवजीका पूजन किया और उन्हें समयानुकूल स्वादिष्ट अन्न भोजन कराकर पूर्णतः तृप्त किया ।। ३६ १/२ ।।

तस्य भुक्तवतस्तात तदन्तःपुरकाननम् ।। ३७ ।।
सुरम्यं दर्शयामासुरैकैकश्येन भारत ।
तात! भरतनन्दन! जब वे भोजन कर चुके, तब वे वारांगनाएँ उन्हें साथ लेकर अन्तःपुरके उस सुरम्य कानन—प्रमदावनकी सैर कराने और वहाँकी एक-एक वस्तुको दिखाने लगीं ।। ३७ १/२ ।।

क्रीडन्त्यश्च हसन्त्यश्च गायन्त्यश्चापिताः शुभम् ।। ३८ ।।
उदारसत्त्वं सत्त्वज्ञाः स्त्रियः पर्यचरंस्तथा ।
उस समय वे हँसती, गाती तथा नाना प्रकारकी सुन्दर क्रीड़ाएँ करती थीं। मनके भावको समझनेवाली वे सुन्दरियाँ उन उदारचित्त शुकदेवजीकी सब प्रकारसे सेवा करने लगीं ।। ३८ १/२ ।।

आरणेयस्तु शुद्धात्मा निःसंदेहः स्वकर्मकृत् ।। ३९ ।।
वश्येन्द्रियो जितक्रोधो न हृष्यति न कुप्यति ।
परंतु अरणिसम्भव शुकदेवजीका अन्तःकरण पूर्णतः शुद्ध था। वे इन्द्रियों और क्रोधपर विजय पा चुके थे। उन्हें न तो किसी बातपर हर्ष होता था और न वे किसीपर क्रोध ही करते थे। उनके मनमें किसी प्रकारका संदेह नहीं था और वे सदा अपने कर्तव्यका पालन किया करते थे ।। ३९ १/२ ।।

तस्मै शय्यासनं दिव्यं देवार्हं रत्नभूषितम् ।। ४० ।।
स्पर्ध्यास्तरणसंकीर्णं ददुस्ताः परमस्त्रियः ।
उन सुन्दरी रमणियोंने देवताओंके बैठने योग्य एक दिव्य पलंग, जिसमें रत्न जड़े हुए थे और जिसपर बहुमूल्य बिछौने बिछे थे, शुकदेवजीको सोनेके लिये दिया ।। ४० १/२ ।।

पादशौचं तु कृत्वैव शुकः संध्यामुपास्य च ।। ४१ ।।
निषसादासने पुण्ये तमेवार्थं विचिन्तयन् ।
पूर्वरात्रे तु तत्रासौ भूत्वा ध्यानपरायणः ।। ४२ ।।
मध्यरात्रे यथान्यायं निद्रामाहारयत् प्रभुः ।
परंतु शुकदेवजीने पहले हाथ-पैर धोकर संध्योपासना की। उसके बाद पवित्र आसनपर बैठकर वे मोक्षतत्त्वका ही विचार करने लगे। रातके पहले पहरमें वे ध्यानस्थ होकर बैठे रहे। फिर रात्रिके मध्यभाग (दूसरे और तीसरे पहर) में प्रभावशाली शुकने यथोचित निद्राको स्वीकार किया ।। ४१-४२ १/२ ।।