महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2174, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विजश्रेष्ठ शुकदेवजीने राजा जनककी ओरसे प्राप्त हुई वह मन्त्रयुक्त सविधि पूजा स्वीकार की। पूजा ग्रहण करनेके पश्चात् गोदान स्वीकार करके राजाको आदर देते हुए महातेजस्वी शुकने उनका सदा बना रहनेवाला कुशल-समाचार पूछा ।। ६-७ ।। अनामयं च राजेन्द्र शुकः सानुचरस्य ह । अनुशिष्टस्तु तेनासौ निषसाद सहानुगः ।। ८ ।। उदारसत्त्वाभिजनो भूमौ राजा कृताञ्जलिः । कुशलं चाव्ययं चैव पृष्ट्वा वैयासकिं नृपः । किमागमनमित्येवं पर्यपृच्छत पार्थिवः ।। ९ ।। राजेन्द्र! सेवकोंसहित राजाके आरोग्यका समाचार भी उन्होंने पूछा। फिर उनकी आज्ञा ले राजा अपने अनुचरवर्गके साथ वहाँ हाथ जोड़े हुए भूमिपर ही बैठ गये। राजाका हृदय तो उदार था ही, उनका कुल भी परम उदार था। उन पृथिवीपति नरेशने व्यासनन्दन शुकसे उनके कुशल-मंगलकी जिज्ञासा करके पूछा—'ब्रह्मन्! किस निमित्तसे यहाँ आपका शुभागमन हुआ है?' ।। ८-९ ।।
शुक उवाच
पित्राहमुक्तो भद्रं ते मोक्षधर्मार्थकोविदः । विदेहराजो याज्यो मे जनको नाम विश्रुतः ।। १० ।। तत्र गच्छस्व वै तूर्णं यदि ते हृदि संशयः । प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा स ते च्छेत्स्यति संशयम् ।। ११ ।। शुकदेवजीने कहा—राजन्! आपका कल्याण हो। मेरे पिताजीने मुझसे कहा है कि मेरे यजमान लोकप्रसिद्ध विदेहराज जनक मोक्षधर्मके विशेषज्ञ हैं। यदि प्रवृत्ति या निवृत्ति-धर्मके विषयमें तुम्हारे हृदयमें कोई संदेह हो तो तुरंत ही उनके पास चले जाओ। वे तुम्हारी सारी शंकाओंका समाधान कर देंगे ।। १०-११ ।।