महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2177, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंआराधना करते हुए अतिथियोंका प्रेमपूर्वक सत्कार करे ॥ १८ ॥ स वनेऽग्नीन् यथान्यायमात्मन्यारोप्य धर्मवित् । निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा ब्रह्मा श्रमपदे वसेत् ॥ १९ ॥ इसके बाद धर्मज्ञ पुरुष शास्त्रीय विधिके अनुसार अग्निहोत्रकी अग्नियोंका आत्मामें आरोप करके निर्द्वन्द्व एवं वीतराग होकर ब्रह्मचिन्तनसे सम्बन्ध रखनेवाले संन्यास-आश्रममें प्रवेश करे ॥ १९ ॥
शुक उवाच
उत्पन्ने ज्ञानविज्ञाने निर्द्वन्द्वे हृदि शाश्वते । किमवश्यं निवस्तव्यमाश्रमेषु भवेत् त्रिषु ॥ २० ॥ शुकदेवजीने पूछा—राजन्! यदि किसीके हृदयमें ब्रह्मचर्य-आश्रममें ही सनातन ज्ञान-विज्ञान प्रकट हो जाय और हृदयके राग-द्वेष आदि द्वन्द्व दूर हो जायँ तो भी क्या उसके लिये शेष तीन आश्रमोंमें रहना आवश्यक है? ॥ २० ॥ एतद् भवन्तं पृच्छामि तद् भवान् वक्तुमर्हति । यथा वेदार्थतत्त्वेन ब्रूहि मे त्वं जनाधिप ॥ २१ ॥ नरेश्वर! मैं यही बात आपसे पूछता हूँ। आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें। वेदके वास्तविक सिद्धान्तके अनुसार क्या करना उचित है? यह आप मुझे बताइये ॥ २१ ॥
जनक उवाच
न विना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत् । न विना गुरुसम्बन्धं ज्ञानस्याधिगमः स्मृतः ॥ २२ ॥ जनकने कहा—ब्रह्मन्! जैसे ज्ञान-विज्ञानके बिना मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार सद्गुरुसे सम्बन्ध हुए बिना ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ २२ ॥ गुरुः प्लावयिता तस्य ज्ञानं प्लव इहोच्यते । विज्ञाय कृतकृत्यस्तु तीर्णस्तदुभयं त्यजेत् ॥ २३ ॥ गुरु इस संसारसागरसे पार उतारनेवाले हैं और उनका दिया हुआ ज्ञान यहाँ नौकाके समान बताया जाता है। मनुष्य उस ज्ञानको पाकर भवसागरसे पार और कृतकृत्य हो जाता है। जैसे नदीको पार कर लेनेपर मनुष्य नाव और नाविक दोनोंको छोड़ देता है, उसी प्रकार मुक्त हुआ पुरुष गुरु और ज्ञान दोनोंको छोड़ दे ॥ २३ ॥ अनुच्छेदाय लोकानामनुच्छेदाय कर्मणाम् । पूर्वैराचरितो धर्मश्चतुराश्रम्यसंकटः ॥ २४ ॥ पहलेके विद्वान् लोकमर्यादाकी तथा कर्मपरम्पराकी रक्षा करनेके लिये चारों आश्रमोंसहित वर्णधर्मोंका पालन करते थे ॥ २४ ॥ अनेन क्रमयोगेन बहुजातिषु कर्मणाम् ।