भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2180, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2180

तमः परिगतं वेश्म यथा दीपेन दृश्यते । तथा बुद्धिप्रदीपेन शक्य आत्मा निरीक्षितुम् ॥ ४० ॥ जैसे अन्धकारसे आच्छादित हुआ घर दीपकके प्रकाशसे देखा जाता है, उसी प्रकार अज्ञानान्धकारसे आवृत्त हुए आत्माका विशुद्ध बुद्धिरूपी दीपकके द्वारा साक्षात्कार किया जा सकता है ॥ ४० ॥ एतत् सर्वं च पश्यामि त्वयि बुद्धिमतां वर । यच्चान्यदपि वेत्तव्यं तत्त्वतो वेद तद् भवान् ॥ ४१ ॥ बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ शुकदेवजी! उपर्युक्त सारी बातें मुझे आपके भीतर दिखायी देती हैं। इनके अतिरिक्त भी जो कुछ जानने योग्य तत्त्व है, उसे आप ठीक-ठीक जानते हैं ॥ ४१ ॥ ब्रह्मर्षे विदितश्चासि विषयान्तमुपागतः । गुरोस्तव प्रसादेन तव चैवोपशिक्षया ॥ ४२ ॥ ब्रह्मर्षे! मैं आपको अच्छी तरह जान गया। आप अपने पिताजीकी कृपा और उन्हींसे मिली हुई शिक्षाद्वारा विषयोंसे परे हो चुके हैं ॥ ४२ ॥ तस्यैव च प्रसादेन प्रादुर्भूतं महामुने । ज्ञानं दिव्यं ममापीदं तेनासि विदितो मम ॥ ४३ ॥ महामुने! उन्हीं गुरुदेवकी कृपासे मुझे भी यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ है, जिससे मैं आपकी स्थितिको ठीक-ठीक समझ गया हूँ ॥ ४३ ॥ अधिकं तव विज्ञानमधिका च गतिस्तव । अधिकं तव चैश्वर्यं तच्च त्वं नावबुध्यसे ॥ ४४ ॥ आपका विज्ञान, आपकी गति और आपका ऐश्वर्य—ये सभी अधिक हैं; परंतु आपको इस बातका पता नहीं है ॥ ४४ ॥ बाल्याद् वा संशयाद् वापि भयाद् वाप्यविमोक्षजात् । उत्पन्ने चापि विज्ञाने नाधिगच्छति तां गतिम् ॥ ४५ ॥ बालस्वभावके कारण, संशयसे अथवा मोक्ष न मिलनेके काल्पनिक भयसे मनुष्यको विज्ञान प्राप्त हो जानेपर भी मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ४५ ॥ व्यवसायेन शुद्धेन मद्विधैश्छिन्नसंशयः । विमुच्य हृदयग्रन्थीनासादयति तां गतिम् ॥ ४६ ॥ मेरे-जैसे लोगों द्वारा जिसका संशय नष्ट हो गया है, वह साधक विशुद्ध निश्चयके द्वारा हृदयकी गाँठ खोलकर उस परमगतिको प्राप्त कर लेता है ॥ ४६ ॥ भवांश्चोत्पन्नविज्ञानः स्थिरबुद्धिरलोलुपः । व्यवसायादृते ब्रह्मन्नासादयति तत्परम् ॥ ४७ ॥ ब्रह्मन्! आपको ज्ञान प्राप्त हो चुका है। आपकी बुद्धि भी स्थिर है तथा आपमें विषयलोलुपताका भी सर्वथा अभाव हो गया है, परंतु विशुद्ध निश्चयके बिना कोई

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