महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2191, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'शिष्यो! यदि तुम्हें यही अच्छा लगता है तो तुम पृथ्वीपर या देवलोकमें जहाँ चाहो जा सकते हो; परंतु प्रमाद न करना; क्योंकि वेदमें बहुत सी परोचनात्मक श्रुतियाँ हैं, जो व्याजसे (फलोंका लोभ दिखाकर) धर्मका प्रतिपादन करती हैं' ।। ६ ।।
तेऽनुज्ञातास्ततः सर्वे गुरुणा सत्यवादिना ।
जग्मुः प्रदक्षिणं कृत्वा व्यासं मूर्ध्नाभिवाद्य च ।। ७ ।।
सत्यवादी गुरुकी यह आज्ञा पाकर सभी शिष्योंने उनके चरणोंपर सिर रखकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् वे व्यासजीकी प्रदक्षिणा करके वहाँसे चले गये' ।। ७ ।।
अवतीर्य महीं तेऽथ चातुर्होत्रमकल्पयन् ।
संयाजयन्तो विप्रांश्च राजन्यांश्च विशस्तथा ।। ८ ।।
पुज्यमाना द्विजैर्नित्यं मोदमाना गृहे रताः ।
याजनाध्यापनरताः श्रीमन्तो लोकविश्रुताः ।। ९ ।।
पृथ्वीपर उतरकर उन्होंने चातुर्होत्र कर्म (अग्निहोत्रसे लेकर सोमयागतक) का प्रचार किया और गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्योंके यज्ञ कराते हुए वे द्विजातियोंसे पूजित हो बड़े आनन्दसे रहने लगे। यज्ञ कराने और वेदोंकी शिक्षा देनेमें ही वे तत्पर रहते थे। इन्हीं कर्मोंके कारण वे श्रीसम्पन्न और लोक-विख्यात हो गये थे ।। ८-९ ।।
अवतीर्णेषु शिष्येषु व्यासः पुत्रसहायवान् ।
तूष्णीं ध्यानपरो धीमानेकान्ते समुपाविशत् ।। १० ।।
शिष्योंके पर्वतसे नीचे उतर जानेपर व्यासजीके साथ उनके पुत्र शुकदेवके सिवा और कोई नहीं रह गया। वे बुद्धिमान् व्यासजी एकान्तमें ध्यानमग्न होकर चुपचाप बैठे थे ।। १० ।।
तं ददर्शाश्रमपदे नारदः सुमहातपाः ।
अथैनमब्रवीत् काले मधुराक्षरया गिरा ।। ११ ।।
उसी समय महातपस्वी नारदजी उस आश्रमपर पधारकर व्यासजीसे मिले और मधुर अक्षरोंसे युक्त मीठी वाणीमें उनसे इस प्रकार बोले— ।। ११ ।।
भो भो ब्रह्मर्षिवाशिष्ठ ब्रह्मघोषो न वर्तते ।
एको ध्यानपरस्तूष्णीं किमास्से चिन्तयन्निव ।। १२ ।।
‘हे ब्रह्मर्षिवासिष्ठ! आज आपके इस आश्रममें वेदमन्त्रोंकी ध्वनि क्यों नहीं हो रही है? आप अकेले ध्यानमग्न होकर चुपचाप क्यों बैठे हैं? जान पड़ता है, आप किसी चिन्तामें मग्न हैं ।। १२ ।।
ब्रह्मघोषैर्विरहितः पर्वतोऽयं न शोभते ।
रजसा तमसा चैव सोमः सोपप्लवो यथा ।। १३ ।।
न भ्राजते यथापूर्वं निषादानामिवालयः ।
देवर्षिगणजुष्टोऽपि वेदध्वनिनिराकृतः ।। १४ ।।