भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2202

जिसे कल्याणप्राप्तिकी इच्छा हो, उसे सभी उपायोंसे काम और क्रोधको दबाना चाहिये; क्योंकि ये दोनों दोष कल्याणका नाश करनेके लिये उद्यत रहते हैं ॥ १० ॥ नित्यं क्रोधात् तपो रक्षेच्छ्रियं रक्षेच्च मत्सरात् । विद्यां मानावमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥ ११ ॥ मनुष्यको चाहिये कि वह सदा तपको क्रोधसे, लक्ष्मीको डाहसे, विद्याको मानापमानसे और अपने-आपको प्रमादसे बचाये ॥ ११ ॥ आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा च परमं बलम् । आत्मज्ञानं परं ज्ञानं न सत्याद् विद्यते परम् ॥ १२ ॥ क्रूर स्वभावका परित्याग सबसे बड़ा धर्म है। क्षमा सबसे बड़ा बल है। आत्माका ज्ञान ही सबसे उत्कृष्ट ज्ञान है और सत्यसे बढ़कर तो कुछ है ही नहीं ॥ १२ ॥ सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् । यद् भूतहितमत्यन्तमेतत् सत्यं मतं मम ॥ १३ ॥ सत्य बोलना सबसे श्रेष्ठ है; परंतु सत्यसे भी श्रेष्ठ है हितकारक वचन बोलना। जिससे प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो, वही मेरे विचारसे सत्य है ॥ १३ ॥ सर्वारम्भपरित्यागी निराशीर्निष्परिग्रहः । येन सर्वं परित्यक्तं स विद्वान् स च पण्डितः ॥ १४ ॥ जो कार्य आरम्भ करनेके सभी संकल्पोंको छोड़ चुका है, जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, जो किसी वस्तुका संग्रह नहीं करता तथा जिसने सब कुछ त्याग दिया है, वही विद्वान् है और वही पण्डित ॥ १४ ॥ इन्द्रियैरिन्द्रियार्थान् यश्चरत्यात्मवशैरिह । असज्जमानः शान्तात्मा निर्विकारः समाहितः ॥ १५ ॥ आत्मभूतैरतद्भूतः सह चैव विनैव च । स विमुक्तः परं श्रेयो नचिरेणाधितिष्ठति ॥ १६ ॥ जो अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा यहाँ अनासक्त भावसे विषयोंका अनुभव करता है, जिसका चित्त शान्त, निर्विकार और एकाग्र है तथा जो आत्मस्वरूप प्रतीत होनेवाले देह और इन्द्रियाँ हैं, उनके साथ रहकर भी उनसे तद्रूप न हो अलग-सा ही रहता है, वह मुक्त है और उसे बहुत शीघ्र परम कल्याणकी प्राप्ति होती है ॥ १५-१६ ॥ अदर्शनमसंस्पर्शस्तथासम्भाषणं सदा । यस्य भूतैः सह मुने स श्रेयो विन्दते परम् ॥ १७ ॥ मुने! जिसकी किसी प्राणीकी ओर दृष्टि नहीं जाती, जो किसीका स्पर्श तथा किसीसे बातचीत नहीं करता, वह परम कल्याणको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥ न हिंस्यात् सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत् । नेदं जन्म समासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ १८ ॥