महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2231, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंआसीत् किल महाराज शुकाभिपतने तदा । महाराज! देवता, गन्धर्व, ऋषि, यक्ष, राक्षस और विद्याधरोंने उनका पूजन किया। वहाँसे शुकदेवजीके ऊपर उठते समय उनके चढ़ाये हुए दिव्य पुष्पोंकी वर्षासे वहाँ सब ओरका सारा आकाश छा गया ॥ १४-१५ १/२ ॥
ततो मन्दाकिनीं रम्यामुपरिष्टादभिव्रजन् ॥ १६ ॥ शुको ददर्श धर्मात्मा पुष्पितद्रुमकाननाम् । राजन्! धर्मात्मा शुकने ऊर्ध्वलोकमें जाते समय खिले हुए वृक्षों और वनोंसे सुशोभित रमणीय मन्दाकिनी (आकाशगंगा) का दर्शन किया ॥ १६ १/२ ॥
तस्यां क्रीडन्त्यभिरतास्ते चैवाप्सरसां गणाः ॥ १७ ॥ शून्याकारं निराकाराः शुकं दृष्ट्वा विवाससः । उसमें बहुत-सी अप्सराएँ स्नान एवं जलक्रीड़ा कर रही थीं। यद्यपि वे नंगी थीं, तो भी शुकदेवजीको शून्याकार (बाह्यज्ञानसे रहित एवं आत्मनिष्ठ) देख अपने शरीरको ढकने या छिपानेके लिये उद्यत नहीं हुईं ॥
तं प्रक्रामन्तमाज्ञाय पिता स्नेहसमन्वितः ॥ १८ ॥ उत्तमां गतिमास्थाय पृष्ठतोऽनुससार ह । उन्हें इस प्रकार सिद्धिके लिये उत्क्रमण करते जान उनके पिता वेदव्यासजी भी स्नेहवश उत्तम गतिका आश्रय ले उनके पीछे-पीछे जाने लगे ॥ १८ १/२ ॥
शुकस्तु मारुतादूर्ध्वं गतिं कृत्वान्तरिक्षगाम् ॥ १९ ॥ दर्शयित्वा प्रभावं स्वं ब्रह्मभूतोऽभवत् तदा । उधर शुकदेव वायुसे आकाशगामिनी ऊर्ध्वगतिका आश्रय ले अपना प्रभाव दिखाकर तत्काल ब्रह्मीभूत हो गये ॥
महायोगगतिं त्वन्यां व्यासोत्थाय महातपाः ॥ २० ॥ निमेषान्तरमात्रेण शुकाभिपतनं ययौ । स ददर्श द्विधा कृत्वा पर्वताग्रं शुकं गतम् ॥ २१ ॥ महातपस्वी व्यासजी दूसरी महायोगसम्बन्धिनी गतिका अवलम्बन करके ऊपरको उठे और पलक मारते-मारते उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँसे उन पर्वत-शिखरोंको दो भागोंमें विदीर्ण करके शुकदेवजी आगे बढ़े थे। वह स्थान शुकाभिपतनके नामसे प्रसिद्ध हो गया था। उन्होंने उस स्थानको देखा ॥ २०-२१ ॥
शशंसुर्ऋषयस्तत्र कर्म पुत्रस्य तत् तदा । ततः शुकेति दीर्घेण शब्देनाक्रन्दितस्तदा ॥ २२ ॥ वहाँ रहनेवाले ऋषियोंने आकर व्यासजीसे उनके पुत्रका वह अलौकिक कर्म कह सुनाया। तब व्यासजीने शुकदेवका नाम लेकर बड़े जोरसे रोदन किया ॥ २२ ॥
स्वयं पित्रा स्वरेणोच्चैस्त्रींल्लोँकाननुनाद्य वै ।