महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2233, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंलज्जित भी हुए ॥ ३०-३१ ॥ तं देवगन्धर्ववृतो महर्षिगणपूजितः । पिनाकहस्तो भगवानभ्यागच्छत शंकरः ॥ ३२ ॥ तमुवाच महादेवः सान्त्वपूर्वमिदं वचः । पुत्रशोकाभिसंतप्तं कृष्णद्वैपायनं तदा ॥ ३३ ॥ इसी समय देवताओं और गन्धर्वोंसे घिरे हुए तथा महर्षियोंसे पूजित पिनाकधारी भगवान् शंकर वहाँ आ पहुँचे और पुत्र-शोकसे संतप्त वेदव्यासजीको सान्त्वना देते हुए कहने लगे— ॥ ३२-३३ ॥ अग्नेर्भूमेरपां वायोरन्तरिक्षस्य चैव ह । वीर्येण सदृशः पुत्रः पुरा मत्तस्त्वया वृतः ॥ ३४ ॥ स तथालक्षणो जातस्तपसा तव सम्भृतः । मम चैव प्रसादेन ब्रह्मतेजोमयः शुचिः ॥ ३५ ॥ ‘ब्रह्मन्! तुमने पहले अग्नि, भूमि, जल, वायु और आकाशके समान शक्तिशाली पुत्र होनेका मुझसे वरदान माँगा था; अतः तुम्हें तुम्हारी तपस्याके प्रभाव तथा मेरी कृपासे पालित वैसा ही पुत्र प्राप्त हुआ। वह ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और परम पवित्र था ॥ ३४-३५ ॥ स गतिं परमां प्राप्तो दुष्प्रापामजितेन्द्रियैः । दैवतैरपि विप्रर्षे तं त्वं किमनुशोचसि ॥ ३६ ॥ ‘ब्रह्मर्षे! इस समय उसने ऐसी उत्तम गति प्राप्त की है, जो अजितेन्द्रिय पुरुषों तथा देवताओंके लिये भी दुर्लभ है, फिर भी तुम उसके लिये क्यों शोक कर रहे हो? ॥ ३६ ॥ यावत् स्थास्यन्ति गिरयो यावत् स्थास्यन्ति सागराः । तावत् तवाक्षया कीर्तिः सपुत्रस्य भविष्यति ॥ ३७ ॥ ‘जबतक इस संसारमें पर्वतोंकी सत्ता रहेगी और जबतक समुद्रोंकी स्थिति बनी रहेगी, तबतक तुम्हारी और तुम्हारे पुत्रकी अक्षय कीर्ति इस संसारमें छायी रहेगी ॥ छायां स्वपुत्रसदृशीं सर्वतोऽनपगां सदा । द्रक्ष्यसे त्वं च लोकेऽस्मिन् मत्प्रसादान्महामुने ॥ ३८ ॥ ‘महामुने! तुम मेरे प्रसादसे इस जगत्में सदा अपने पुत्रसदृश छायाका दर्शन करते रहोगे। वह सब ओर दिखायी देगी, कभी तुम्हारी आँखोंसे ओझल न होगी’ ॥ सोऽनुनीतो भगवता स्वयं रुद्रेण भारत । छायां पश्यन् समावृत्तः स मुनिः परया मुदा ॥ ३९ ॥ भरतनन्दन! साक्षात् भगवान् शंकरके इस प्रकार आश्वासन देनेपर सर्वत्र अपने पुत्रकी छाया देखते हुए मुनिवर व्यास बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने आश्रमपर लौट आये ॥ ३९ ॥ इति जन्म गतिश्चैव शुकस्य भरतर्षभ । विस्तरेण समाख्याता यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ४० ॥