भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 224

जो मोहके वशीभूत हो प्रमाणभूत धर्म और उसका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रको अमान्य कर दें, वह सेवक हो या पुत्र, तपस्वी हो या और कोई; सभी उपायोंसे उन पापियोंका दमन करे अथवा उन्हें नष्ट कर डाले ।। ६ १/२ ।।
अतोऽन्यथा वर्तमानो राजा प्राप्नोति किल्बिषम् ।। ७ ।।
धर्मं विनश्यमानं हि यो न रक्षेत् स धर्महा ।
इसके विपरीत आचरण करनेवाला राजा पापका भागी होता है, जो नष्ट होते हुए धर्मकी रक्षा नहीं करता, वह राजा धर्मका घात करनेवाला है ।। ७ १/२ ।।
ते त्वया धर्महन्तारो निहताः सपदानुगाः ।। ८ ।।
स्वधर्मे वर्तमानस्त्वं किं नु शोचसि पाण्डव ।
राजा हि हन्याद् दद्याच्च प्रजा रक्षेच्च धर्मतः ।। ९ ।।
पाण्डुनन्दन! तुमने तो उन्हीं लोगोंका सेवकोंसहित वध किया है, जो धर्मका नाश करनेवाले थे। अपने धर्ममें स्थित रहते हुए भी तुम शोक क्यों कर रहे हो? क्योंकि राजाका यह कर्तव्य ही है कि वह धर्मद्रोहियोंका वध करे, सुपात्रोंको दान दे और धर्मके अनुसार प्रजाकी रक्षा करे ।।

युधिष्ठिर उवाच

न तेऽभिशंके वचनं यद् ब्रवीषि तपोधन ।
अपरोक्षो हि ते धर्मः सर्वधर्मविदां वर ।। १० ।।
युधिष्ठिर बोले— सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ तपोधन! आपको धर्मके स्वरूपका प्रत्यक्ष ज्ञान है। आप जो बात कह रहे हैं, उसपर मुझे तनिक भी संदेह नहीं है ।। १० ।।
मया त्ववध्या बहवो घातिता राज्यकारणात् ।
तानि कर्माणि मे ब्रह्मन् दहन्ति च पचन्ति च ।। ११ ।।
परंतु ब्रह्मन्! मैंने तो इस राज्यके लिये अनेक अवध्य पुरुषोंका भी वध करा डाला है। मेरे वे ही कर्म मुझे जलाते और पकाते हैं ।। ११ ।।

व्यास उवाच

ईश्वरो वा भवेत् कर्ता पुरुषो वापि भारत ।
हठो वा वर्तते लोके कर्मजं वा फलं स्मृतम् ।। १२ ।।
व्यासजीने कहा— भरतनन्दन! जो लोग मारे गये हैं, उनके वधका उत्तरदायित्व किसपर है? इस प्रश्नको लेकर चार विकल्प हो सकते हैं। (१) सबका प्रेरक ईश्वर कर्ता है? या (२) वध करनेवाला पुरुष कर्ता है? अथवा (३) मारे जानेवाले पुरुषका हठ (बिना विचारे किसी कामको कर डालनेका दुराग्रही स्वभाव) कर्ता है? अथवा (४) उसके प्रारब्ध कर्मका फल इस रूपमें प्राप्त होनेके कारण प्रारब्ध ही कर्ता है? ।। १२ ।।
ईश्वरेण नियुक्तो हि साध्वसाधु च भारत ।

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