भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2240

श्रीभगवान् बोले— ब्रह्मन्! तुमने जिसके विषयमें प्रश्न किया है, वह अपने लिये गोपनीय विषय है। यद्यपि यह सनातन रहस्य किसीसे कहने योग्य नहीं है, तथापि तुम-जैसे भक्त पुरुषको तो उसे बताना ही चाहिये; अतः मैं यथार्थ रूपसे इस विषयका वर्णन करूँगा॥ २८॥

यत् तत् सूक्ष्ममविज्ञेयमव्यक्तमचलं ध्रुवम्।
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थैश्च सर्वभूतैश्च वर्जितम्॥ २९॥
स ह्यन्तरात्मा भूतानां क्षेत्रज्ञश्चेति कथ्यते।
त्रिगुणव्यतिरिक्तो वै पुरुषश्चेति कल्पितः॥ ३०॥
तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम।
अव्यक्ता व्यक्तभावस्था या सा प्रकृतिरव्यया॥ ३१॥
जो सूक्ष्म, अज्ञेय, अव्यक्त, अचल और ध्रुव है, जो इन्द्रियों, विषयों और सम्पूर्ण भूतोंसे परे है, वही सब प्राणियोंका अन्तरात्मा है; अतः क्षेत्रज्ञ नामसे कहा जाता है, वही त्रिगुणातीत तथा पुरुष कहलाता है। उसीसे त्रिगुणमय अव्यक्तकी उत्पत्ति हुई है। द्विजश्रेष्ठ! उसीको व्यक्तभावमें स्थित, अविनाशिनी अव्यक्त प्रकृति कहा गया है॥ २९—३१॥

तां योनिमावयोर्र्विद्धि योऽसौ सदसदात्मकः।
आवाभ्यां पूज्यतेऽसौ हि दैवे पित्र्ये च कल्प्यते॥ ३२॥
वह सदसत्स्वरूप परमात्मा ही हम दोनोंकी उत्पत्तिका कारण है, इस बातको जान लो। हम दोनों उसीकी पूजा करते तथा उसीको देवता और पितर मानते हैं॥ ३२॥

नास्ति तस्मात् परोऽन्यो हि पिता देवोऽथवा द्विज।
आत्मा हि नः स विज्ञेयस्ततस्तं पूजयावहे॥ ३३॥
ब्रह्मन्! उससे बढ़कर दूसरा कोई देवता या पितर नहीं है। वही हमलोगोंका आत्मा है, यह जानना चाहिये। अतः हम उसीकी पूजा करते हैं॥ ३३॥

तेनैषा प्रथिता ब्रह्मन् मर्यादा लोकभाविनी।
दैवं पित्र्यं च कर्तव्यमिति तस्यानुशासनम्॥ ३४॥
ब्रह्मन्! उसीने लोकको उन्नतिके पथपर ले जानेवाली यह धर्मकी मार्यादा स्थापित की है। देवताओं और पितरोंकी पूजा करनी चाहिये, यह उसीकी आज्ञा है॥

ब्रह्मा स्थाणुर्मनुर्दक्षो भृगुर्धर्मस्तपो यमः।
मरीचिरङ्गिराऽत्रिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः॥ ३५॥
वसिष्ठः परमेष्ठी च विवस्वान् सोम एव च।
कर्दमश्चापि यः प्रोक्तः क्रोधो विक्रीत एव च॥ ३६॥
एकविंशतिरुत्पन्नास्ते प्रजापतयः स्मृताः।
तस्य देवस्य मर्यादां पूजयन्तः सनातनीम्॥ ३७॥