महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2244, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतं चादिदेवं सततं प्रपन्न एकान्तभावेन वृणोम्यजस्रम् ॥ ४ ॥ एभिर्विशेषैः परिशुद्धसत्त्वः कस्मान्न पश्येयमनन्तमीशम् । शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार हाथ, पैर, उदर और उपस्थ—इन चारोंकी मैंने रक्षा की है। शत्रु और मित्रके प्रति मैं सदा समानभाव रखता हूँ। इन आदिदेव परमात्मा श्रीनारायणकी निरन्तर शरण लेकर मैं अनन्य-भावसे सदा उन्हींका भजन करता हूँ। इन सब विशेष कारणोंसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया है। ऐसी दशामें मैं उन अनन्त परमेश्वरका दर्शन कैसे नहीं कर सकता हूँ? ॥ ४ १/३ ॥
तत् पारमेष्ठ्यस्य वचो निशम्य नारायणः शाश्वतधर्मगोप्ता ॥ ५ ॥ गच्छेति तं नारदमुक्तवान् स सम्पूजयित्वाऽऽत्मविधिक्रियाभिः । ब्रह्मपुत्र नारदजीका यह वचन सुनकर सनातन धर्मके रक्षक भगवान् नारायणने उनकी विधिवत् पूजा करके उन्हें जानेकी आज्ञा दे दी ॥ ५ १/३ ॥
ततो विसृष्टः परमेष्ठिपुत्रः सोऽभ्यर्चयित्वा तमृषिं पुराणम् ॥ ६ ॥ खमुत्पपातोत्तमयोगयुक्त- स्ततोऽधिमेरौ सहसा निलिल्ये । उनसे विदा लेकर ब्रह्मकुमार नारद उन पुरातन ऋषि नारायणका पूजन करके उत्तम योगसे युक्त हो आकाशकी ओर उड़े और सहसा मेरुपर्वतपर पहुँचकर अदृश्य हो गये ॥ ६ १/३ ॥
तत्रावतस्थे च मुनिर्मुहूर्त- मेकान्तमासाद्य गिरेः स शृङ्गे ॥ ७ ॥ आलोकयन्नुत्तरपश्चिमेन ददर्श चाप्यद्भुतमुक्त रूपम् । मेरुके शिखरपर एकान्त स्थानमें जाकर नारद मुनिने दो घड़ीतक विश्राम किया। फिर वहाँसे उत्तर-पश्चिमकी ओर दृष्टिपात करनेपर उन्होंने पूर्व-वर्णित एक अद्भुत दृश्य देखा ॥ ७ १/३ ॥
क्षीरोदधेर्योत्तरतो हि द्वीपः श्वेतः स नाम्ना प्रथितो विशालः ॥ ८ ॥ मेरोः सहस्रैः स हि योजनानां द्वात्रिंशतोर्ध्वं कविभिर्निरुक्तः ।