भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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भविष्यति प्रमाणं वै एतन्मदनुशासनम् । 'ब्राह्मणो! जैसे मेरे प्रसादसे उत्पन्न ब्रह्मा प्रमाणभूत हैं एवं जैसे क्रोधसे उत्पन्न रुद्र, तुम सब प्रजापति, सूर्य, चन्द्रमा, वायु, भूमि, जल, अग्नि, सम्पूर्ण नक्षत्रगण तथा अन्यान्य भूतनामधारी पदार्थ और ब्रह्मवादी ऋषिगण अपने-अपने अधिकारके अनुसार बर्ताव करते हुए प्रमाणभूत माने जाते हैं, उसी प्रकार तुमलोगोंका बनाया हुआ यह उत्तम शास्त्र भी प्रामाणिक माना जायगा, यह मेरी आज्ञा है ।। ४१-४३ १/३ ।। तस्मात् प्रवक्ष्यते धर्मान् मनुः स्वायम्भुवः स्वयम् ।। ४४ ।। उशना बृहस्पतिश्चैव यदोत्पन्नौ भविष्यतः । तदा प्रवक्ष्यतः शास्त्रं युष्मन्मतिभिरुद्धृतम् ।। ४५ ।। 'स्वायम्भुव मनु स्वयं इसी ग्रन्थके अनुसार धर्मोंका उपदेश करेंगे। शुक्राचार्य और बृहस्पति जब प्रकट होंगे तब वे भी तुम्हारी बुद्धिसे निकले हुए इस शास्त्रका प्रवचन करेंगे ।। ४४-४५ ।। स्वायम्भुवेषु धर्मेषु शास्त्रे चौशनसे कृते । बृहस्पतिमते चैव लोकेषु प्रतिचारिते ।। ४६ ।। युष्मत्कृतमिदं शास्त्रं प्रजापालो वसुस्ततः । बृहस्पतिसकाशाद् वै प्राप्स्यते द्विजसत्तमाः ।। ४७ ।। 'द्विजश्रेष्ठगण! स्वायम्भुव मनुके धर्मशास्त्र, शुक्राचार्यके शास्त्र तथा बृहस्पतिके मतका जब लोकमें प्रचार हो जायगा, तब प्रजापालक वसु (राजा उपरिचर) बृहस्पतिजीसे तुम्हारे बनाये हुए इस शास्त्रका अध्ययन करेगा ।। ४६-४७ ।। स हि सद्भावितो राजा मद्भक्तश्च भविष्यति । तेन शास्त्रेण लोकेषु क्रियाः सर्वाः करिष्यति ।। ४८ ।। 'सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित वह राजा मेरा बड़ा भक्त होगा और लोकमें उसी शास्त्रके अनुसार सम्पूर्ण कार्य करेगा ।। ४८ ।। एतद्धि युष्मच्छास्त्राणां शास्त्रमुत्तमसंज्ञितम् । एतदर्थ्यं च धर्म्यं च रहस्यं चैतदुत्तमम् ।। ४९ ।। 'तुम्हारा बनाया हुआ यह शास्त्र सब शास्त्रोंसे श्रेष्ठ माना जायगा। यह धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र एवं उत्तम रहस्यमय ग्रन्थ है ।। ४९ ।। अस्य प्रवर्त्तनाच्चैव प्रजावन्तो भविष्यथ । स च राजश्रिया युक्तो भविष्यति महान् वसुः ।। ५० ।। इसके प्रचारसे तुम सब लोग संतानवान् होओगे; अर्थात् तुम्हारी प्रजाकी वृद्धि होगी तथा राजा उपरिचर भी राजलक्ष्मीसे सम्पन्न एवं महान् पुरुष होगा ।। ५० ।। संस्थिते तु नृपे तस्मिन् शास्त्रमेतत् सनातनम् । अन्तर्धास्यति तत् सर्वमेतद् वः कथितं मया ।। ५१ ।।