भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2263, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2263

ऋषि बोले—नरेश्वर! हमलोगोंका पक्ष यह है कि अन्नसे यज्ञ करना चाहिये तथा देवताओंका पक्ष यह है कि छाग नामक पशुके द्वारा यज्ञ होना चाहिये। राजन्! अब आप हमें अपना निर्णय बताइये॥ १२१/३॥

भीष्म उवाच

देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसंश्रयात् ॥ १३॥
छागेनाजेन यष्टव्यमेवमुक्तं वचस्तदा ।
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! देवताओंका मत जानकर राजा वसुने उन्हींका पक्ष लेकर कह दिया कि अजका अर्थ है, छाग (बकरा); अतः उसीके द्वारा यज्ञ करना चाहिये॥ १३१/३॥

कुपितास्ते ततः सर्वे मुनयः सूर्यवर्चसः ॥ १४॥
ऊचुर्वसुं विमानस्थं देवपक्षार्थवादिनम् ।
यह सुनकर वे सभी सूर्यके समान तेजस्वी ऋषि कुपित हो उठे और विमानपर बैठकर देवपक्षकी बात कहनेवाले वसुसे बोले—॥ १४१/३॥

सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात् तस्माद् दिवः पत ॥ १५॥
अद्यप्रभृति ते राजन्नाकाशे विहता गतिः ।
अस्मच्छापाभिघातेन महीं भित्त्वा प्रवेक्ष्यसि ॥ १६॥
‘राजन्! तुमने यह जानकर भी कि अजका अर्थ अन्न है, देवताओंका पक्ष लिया है; इसलिये स्वर्गसे नीचे गिर जाओ। आजसे तुम्हारी आकाशमें विचरनेकी शक्ति नष्ट हो गयी। हमारे शापके आघातसे तुम पृथ्‍वीको भेदकर पातालमें प्रवेश करोगे॥ १५-१६॥

(विरुद्धं वेदसूत्राणामुक्तं यदि भवेन्नृप ।
वयं विरुद्धवचना यदि तत्र पतामहे ॥)
‘नरेश्वर! तुमने यदि वेद और सूत्रोंके विरुद्ध कहा हो तो हमारा यह शाप अवश्य लागू हो और यदि हम शास्त्रविरुद्ध वचन कहते हों तो हमारा पतन हो जाय’॥

ततस्तस्मिन् मुहूर्तेऽथ राजोपरिचरस्तदा ।
अधो वै सम्बभूवाशु भूमेर्विवरगो नृप ॥ १७॥
राजन्! ऋषियोंके इतना कहते ही उसी क्षण राजा उपरिचर आकाशसे नीचे आ गये और तत्काल पृथ्‍वीके विवरमें प्रवेश कर गये॥ १७॥

स्मृतिस्त्वेनं न हि जहौ तदा नारायणाज्ञया ।
देवास्तु सहिताः सर्वे वसोः शापविमोक्षणम् ॥ १८॥
चिन्तयामासुर्व्यग्राः सुकृतं हि नृपस्य तत् ।
अनेनास्मत्कृते राज्ञा शापः प्राप्तो महात्मना ॥ १९॥