महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2273, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार वे सनातन भगवान् श्रीहरि अपने स्वरूपमें नाना प्रकारके रंग धारण किये हुए थे। उनके हजारों नेत्र, सैकड़ों (हजारों) मस्तक, हजारों पैर, हजारों उदर और हजारों हाथ थे। वे अपूर्व कान्तिसे सम्पन्न थे और कहीं-कहीं उनकी आकृति अव्यक्त थी॥ ६ १/२॥ ओङ्कारमुद्गिरन् वक्त्रात् सावित्रीं तदन्वयाम्॥ ७॥ शेषेभ्यश्चैव वक्त्रेभ्यश्चतुर्वेदान् गिरन् बहून्। आरण्यकं जगौ देवो हरिनारायणो वशी॥ ८॥ सबको वशमें रखनेवाले वे भगवान् नारायण हरि एक मुखसे तो ओङ्कार तथा उससे सम्बन्ध रखनेवाली गायत्रीका जप करते थे एवं अन्यान्य मुखोंसे चारों वेदों और उनके आरण्यकभागका गान कर रहे थे॥ ७-८॥ वेदिं कमण्डलुं शुभ्रान् मणीनुपानहौ कुशान्। अजिनं दण्डकाष्ठं च ज्वलितं च हुताशनम्॥ ९॥ धारयामास देवेशो हस्तैर्यज्ञपतिस्तदा। यज्ञोंके स्वामी उन भगवान् देवेश्वर विष्णुने उस समय अपने हाथोंमें यज्ञवेदी, कमण्डलु, चमकीले मणिरत्न, उपानह, कुशा, मृगचर्म, दण्ड-काष्ठ और प्रज्वलित अग्नि—ये सब वस्तुएँ ले रखी थीं॥ ९ १/२॥ तं प्रसन्नं प्रसन्नात्मा नारदो द्विजसत्तमः॥ १०॥ वाग्यतः प्रणतो भूत्वा ववन्दे परमेश्वरम्। उनका दर्शन करनेके पश्चात् प्रसन्नचित्त हुए द्विजश्रेष्ठ नारदने मौनभावसे नतमस्तक हो उन प्रसन्न हुए परमेश्वरकी वन्दना की॥ १० १/२॥ तमुवाच नतं मूर्ध्ना देवानामादिरव्ययः॥ ११॥ मस्तक झुकाकर चरणोंमें पड़े हुए नारदजीसे देवताओंके आदिकारण अविनाशी श्रीहरिने इस प्रकार कहा॥ ११॥
श्रीभगवानुवाच
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षयः। इमं देशमनुप्राप्ता मम दर्शनलालसाः॥ १२॥ **श्रीभगवान् बोले—**देवर्षे! महर्षि एकत, द्वित और त्रित—ये सब भी मेरे दर्शनकी इच्छासे इस स्थानपर आये हुए थे॥ १२॥ न च मां ते ददृशिरे न च द्रक्ष्यति कश्चन। ऋते ह्यैकान्तिकश्रेष्ठात् त्वं चैवैकान्तिकोत्तमः॥ १३॥ किंतु उन्हें मेरा दर्शन न प्राप्त हो सका। वास्तवमें मेरे अनन्य भक्तके सिवा और कोई मनुष्य मेरा दर्शन नहीं कर सकता। तुम तो मेरे अनन्य भक्तोंमें श्रेष्ठ हो; इसीलिये तुम्हें मेरा दर्शन हुआ है॥ १३॥