भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2326, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2326

महर्षियोंके मन्त्र अब कुछ काम नहीं दे रहे थे। राक्षस बढ़ गये। वेदोंका स्वाध्याय बंद हो गया। तीनों लोक इन्द्रसे अरक्षित होनेके कारण निर्बल एवं सुगमतासे जीत लेने योग्य हो गये ॥४३॥

अथ देवा ऋषयश्चायुषः पुत्रं नहुषं नाम देवराज्येऽभिषिषिचुर्नहुषः पञ्चभिः शतैर्ज्योतिषां ललाटे ज्वलद्भिः सर्वतेजोहरैस्त्रिविष्टपं पालयांबभूव ॥४४॥

तदनन्तर देवताओं और ऋषियोंने आयुके पुत्र नहुषको देवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया। नहुषके ललाटमें समस्त प्राणियोंके तेजको हर लेनेवाली पाँच सौ प्रज्वलित ज्योतियाँ जगमगाती रहती थीं। उनके द्वारा वे स्वर्गके राज्यका पालन करने लगे ॥४४॥

अथ लोकाः प्रकृतिमापेदिरे स्वस्थाश्च हृष्टाश्च बभूवुः ॥४५॥

ऐसा होनेपर सब लोग स्वाभाविक स्थितिमें आ गये। सभी स्वस्थ एवं प्रसन्न हो गये ॥४५॥

अथोवाच नहुषः सर्वं मां शक्रोपभुक्तमुपस्थितमृते शचीमिति स एवमुक्त्वा शचीसमीपमगमदुवाचैनां सुभगेऽहमिन्द्रो देवानां भजस्व मामिति तं शची प्रत्युवाच प्रकृत्या त्वं धर्मवत्सलः सोमवंशोद्भवश्च नार्हसि परपत्नीधर्षणं कर्तुमिति ॥४६॥

कुछ कालके पश्चात् नहुषने देवताओंसे कहा—'इन्द्रके उपभोगमें आनेवाली अन्य सारी वस्तुएँ तो मेरी सेवामें उपस्थित हैं। केवल शची मुझे नहीं मिली हैं।' ऐसा कहकर वे शचीके पास गये और उनसे बोले—'सौभाग्यशालिनि! मैं देवताओंका राजा इन्द्र हूँ। मेरी सेवा स्वीकार करो।' शचीने उत्तर दिया—'महाराज! आप स्वभावसे ही धर्मवत्सल और चन्द्रवंशके रत्न हैं। आपको परायी स्त्रीपर बलात्कार नहीं करना चाहिये' ॥४६॥

तामथोवाच नहुष ऐन्द्रं पदमध्यास्यते मया-ऽहमिन्द्रस्य राज्यरत्नहरो नात्राधर्मः कश्चित् त्वमिन्द्रोप-भुक्तेति सा तमुवाचास्ति मम किंचिद् व्रतमपर्यवसितं तस्यावभृथे त्वामुपगमिष्यामि कैश्चिदेवाहोभिरिति स शच्येवमभिहितो जगाम ॥४७॥

तब नहुषने शचीसे कहा—'देवि! इस समय मैं इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हूँ। इन्द्रके राज्य और रत्न दोनोंका अधिकारी हो गया हूँ; अतः तुम्हारे साथ समागम करनेमें कोई अधर्म नहीं है; क्योंकि तुम इन्द्रके उपभोगमें आयी हुई वस्तु हो।' यह सुनकर शचीने कहा—'महाराज! मैंने एक व्रत ले रखा है। वह अभी समाप्त नहीं हुआ है। उसकी समाप्ति हो जानेपर कुछ ही दिनोंमें मैं आपकी सेवामें उपस्थित होऊँगी।' शचीके ऐसा कहनेपर नहुष चले गये ॥४७॥

अथ शची दुःखशोकार्ता भर्तृदर्शनलालसा नहुष-भयगृहीता बृहस्पतिमुपागच्छत् स च तामत्युद्विग्नां दृष्ट्वैव ध्यानं प्रविश्य भर्तृकार्यतत्परां ज्ञात्वा बृहस्पति-रुवाचानेनैव व्रतेन तपसा चान्विता देवीं वरदामुप-श्रुतिमाह्वय तदा सा ते इन्द्रं दर्शयिष्यतीति साऽथ महानियमस्थिता देवीं वरदामुपश्रुतिं मन्त्रैराह्वयति सोपश्रुतिः शचीसमीपमगादुवाच चैनामियमस्मीति त्वयाऽऽहूतोपस्थिता किं ते प्रियं करवाणीति