महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुम तो जन्मसे ही शुद्ध स्वभावके हो। तुम्हारे मनमें युद्धकी इच्छा बिल्कुल नहीं थी। शत्रुओंके अपराधसे ही तुम्हें इस कार्यमें प्रवृत्त होना पड़ा। तुम यह युद्धकर्म करके भी निरन्तर पश्चात्ताप ही कर रहे हो ॥ ३७ ॥
अश्वमेधो महायज्ञः प्रायश्चित्तमुदाहृतम् ।
तमाहर महाराज विपाप्मैवं भविष्यसि ॥ ३८ ॥
इसके लिये महान् यज्ञ अश्वमेध ही प्रायश्चित्त बताया गया है। महाराज! तुम इस यज्ञका अनुष्ठान करो। ऐसा करनेसे तुम पापरहित हो जाओगे ॥ ३८ ॥
मरुद्भिः सह जित्वारीन् भगवान् पाकशासनः ।
एकैकं क्रतुमाहृत्य शतकृत्वः शतक्रतुः ॥ ३९ ॥
मरुद्गणोंसहित भगवान् पाकशासन इन्द्रने शत्रुओंको जीतकर एक-एक करके सौ बार अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया। इससे वे 'शतक्रतु' नामसे विख्यात हो गये ॥ ३९ ॥
धूतपाप्माजितस्वर्गो लोकान् प्राप्य सुखोदयान् ।
मरुद्गणैर्वृतः शक्रः शुशुभे भासयन् दिशः ॥ ४० ॥
उनके सारे पाप धुल गये। उन्होंने स्वर्गपर विजय पायी और सुखदायक लोकोंमें पहुँचकर वे इन्द्र सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए मरुद्गणोंके साथ शोभा पाने लगे ॥ ४० ॥
स्वर्गे लोके महीयन्तमप्सरोभिः शचीपतिम् ।
ऋषयः पर्युपासन्ते देवाश्च विबुधेश्वरम् ॥ ४१ ॥
स्वर्गलोकमें अप्सराओंद्वारा पूजित होनेवाले शचीपति देवराज इन्द्रकी सम्पूर्ण देवता और महर्षि भी उपासना करते हैं ॥ ४१ ॥
सेयं त्वामनुसम्प्राप्ता विक्रमेण वसुन्धरा ।
निर्जिताश्च महीपाला विक्रमेण त्वयानघ ॥ ४२ ॥
अनघ! तुमने भी इस वसुन्धराको अपने पराक्रमसे प्राप्त किया है और भुजाओंके बलसे समस्त राजाओंको परास्त किया है ॥ ४२ ॥
तेषां पुराणि राष्ट्राणि गत्वा राजन् सुहृद्वृतः ।
भ्रातॄन् पुत्रांश्च पौत्रांश्च स्वे स्वे राज्येऽभिषेचय ॥ ४३ ॥
राजन्! अब तुम अपने सुहृदोंके साथ उनके देश और नगरोंमें जाकर उनके भाइयों, पुत्रों अथवा पौत्रोंको अपने-अपने राज्यपर अभिषिक्त करो ॥ ४३ ॥
बालानपि च गर्भस्थान् सान्त्वेन समुदाचरन् ।
रञ्जयन् प्रकृतीः सर्वाः परिपाहि वसुन्धराम् ॥ ४४ ॥
जिनके उत्तराधिकारी अभी बालक हों या गर्भमें हों, उनकी प्रजाको समझा-बुझाकर सान्त्वनाद्वारा शान्त करो और सारी प्रजाका मनोरंजन करते हुए इस पृथ्वीका पालन करो ॥ ४४ ॥