महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2332, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं।' तब भृगुने कहा—'मैं कन्याका वरण करनेकी भावना लेकर यहाँ आया था, किंतु तुमने मेरी उपेक्षा कर दी है; इसलिये मैं शाप देता हूँ कि तुम रत्नोंके भण्डार नहीं होओगे'॥ ६२॥
अद्यप्रभृत्येतदवस्थितमृषिवचनं तदेवंविधं माहात्म्यं ब्राह्मणानाम्॥ ६३॥ आज भी महर्षिका वह वचन हिमवान्पर ज्यों-का-त्यों लागू हो रहा है। ऐसा ब्राह्मणोंका माहात्म्य है॥ ६३॥
क्षत्रमपि च ब्राह्मणप्रसादादेव शाश्वतीमव्ययां च पृथिवीं पत्नीमभिगम्य बुभुजे॥ ६४॥ क्षत्रिय जाति भी ब्राह्मणोंकी कृपासे ही सदा रहनेवाली इस अविनाशिनी पृथ्वीको पत्नीकी भाँति पाकर इसका उपभोग करती है॥ ६४॥
यदेतद् ब्रह्माग्नीषोमीयं तेन जगद् धार्यते॥ ६५॥ यह जो अग्नि और सोमसम्बन्धी ब्रह्म है, उसीके द्वारा सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है॥ ६५॥
उच्यते—
सूर्याचन्द्रमसौ चक्षुः केशाश्चैवांशवः स्मृताः।
बोधयंस्तापयंश्चैव जगदुत्तिष्ठते पृथक्॥ ६६॥
कहते हैं कि सूर्य और चन्द्रमा (अग्नि और सोम) मेरे नेत्र हैं तथा उनकी किरणोंको केश कहा गया है। सूर्य और चन्द्रमा जगत्को क्रमशः ताप और मोद प्रदान करते हुए पृथक्-पृथक् उदित होते हैं॥ ६६॥
(नाम्नां निरुक्तं वक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रमानसः।)
बोधनात् तापनाच्चैव जगतो हर्षणं भवेत्।
अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन।
हृषीकेशोऽहमीशानो वरदो लोकभावनः॥ ६७॥
अब मैं अपने नामोंकी व्याख्या करूँगा। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। जगत्को मोद और ताप प्रदान करनेके कारण चन्द्रमा और सूर्य हर्षदायक होते हैं। पाण्डुनन्दन! अग्नि और सोमद्वारा किये गये इन कर्मोंद्वारा मैं विश्वभावन वरदायक ईश्वर ही 'हृषीकेश'* कहलाता हूँ॥ ६७॥
इलोपहूतयोगेन हरे भागं क्रतुष्वहम्।
वर्णश्च मे हरिः श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरिहं स्मृतः॥ ६८॥
यज्ञमें 'इलोपहूता सह दिवा' आदि मन्त्रसे आवाहन करनेपर मैं अपना भाग हरण (स्वीकार) करता हूँ तथा मेरे शरीरका रंग भी हरित (श्याम) है, इसलिये मुझे 'हरि' कहते हैं॥ ६८॥
धाम सारो हि भूतानाम् ऋतं चैव विचारितम्।