महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2334, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर रखा है; इसलिये मेरे नाभि-कमलरूप ब्रह्मलोकमें रहनेवाले ऋषिगण मुझे ‘सत्य’ कहते हैं॥ ७५-७६॥
सत्त्वान्नच्युतपूर्वोऽहं सत्त्वं वै विद्धि मत्कृतम्।
जन्मनीहा भवेत् सत्त्वं पौर्विकं मे धनंजय॥ ७७॥
निराशीः कर्मसंयुक्तः सत्त्वतश्चाप्यकल्मषः।
सात्त्वतज्ञानदृष्टोऽहं सत्त्वतामिति सात्त्वतः॥ ७८॥
धनंजय! मैं पहले कभी सत्त्वसे च्युत नहीं हुआ हूँ। सत्त्वको मुझसे ही उत्पन्न हुआ समझो। मेरा वह पुरातन सत्त्व इस अवतारकालमें भी विद्यमान है। सत्त्वके कारण ही मैं पापसे रहित हो निष्कामकर्ममें लगा रहता हूँ। भगवत्प्राप्त पुरुषोंके सात्त्वतज्ञान (पांचरात्रादि वैष्णवतन्त्र) से मेरे स्वरूपका बोध होता है। इन सब कारणोंसे लोग मुझे ‘सात्त्वत’ कहते हैं॥ ७७-७८॥
कृषामि मेदिनीं पार्थ भूत्वा कार्ष्णायसो महान्।
कृष्णो वर्णश्च मे यस्मात् तस्मात् कृष्णोऽहमर्जुन॥ ७९॥
पृथापुत्र अर्जुन! मैं काले लोहेका विशाल फाल बनकर इस पृथ्वीको जोतता हूँ तथा मेरे शरीरका रंग भी काला है, इसलिये मैं ‘कृष्ण’ कहलाता हूँ*॥ ७९॥
मया संश्लेषिता भूमिरद्भिर्व्योम च वायुना।
वायुश्च तेजसा सार्धं वैकुण्ठत्वं ततो मम॥ ८०॥
मैंने भूमिको जलके साथ, आकाशको वायुके साथ और वायुको तेजके साथ संयुक्त किया है। इसलिये (विगता कुण्ठा पंचानां भूतानां मेलने असामर्थ्यं यस्य सः विकुण्ठः, विकुण्ठ एव वैकुण्ठः—पाँचों भूतोंको मिलानेमें जिनकी शक्ति कभी कुण्ठित नहीं होती, वे भगवान् वैकुण्ठ हैं, इस व्युत्पत्ति के अनुसार) मैं ‘वैकुण्ठ’ कहलाता हूँ॥ ८०॥
निर्वाणं परमं ब्रह्म धर्मोऽसौ पर उच्यते।
तस्मान्न च्युतपूर्वोऽहमच्युतस्तेन कर्मणा॥ ८१॥
परम शान्तिमय जो ब्रह्म है, वही परम धर्म कहा गया है। उससे पहले कभी मैं च्युत नहीं हुआ हूँ, इसलिये लोग मुझे ‘अच्युत’ कहते हैं॥ ८१॥
पृथिवीनभसी चोभे विश्रुते विश्वतोमुखे।
तयोः संधारणार्थं हि मामधोक्षजमज्जसा॥ ८२॥
(‘अधः’ का अर्थ है पृथ्वी, ‘अक्ष’ का अर्थ है आकाश और ‘ज’ का अर्थ है इनको धारण करनेवाला) पृथ्वी और आकाश दोनों सर्वतोमुखी एवं प्रसिद्ध हैं। उनको अनायास ही धारण करनेके कारण लोग मुझे ‘अधोक्षज’ कहते हैं॥ ८२॥
निरुक्तं वेदविदुषो वेदशब्दार्थचिन्तकाः।
ते मां गायन्ति प्राग्वंशे अधोक्षज इति स्थितिः॥ ८३॥