महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2341, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'धर्मकुलमें उत्पन्न हुए ये दोनों महाव्रती देवश्रेष्ठ नर और नारायण महान् तपस्यासे युक्त हैं ॥ १२७ ॥ अहं प्रसादजस्तस्य कुतश्चित् कारणान्तरे । त्वं चैव क्रोधजस्तात पूर्वसर्गे सनातनः ॥ १२८ ॥ 'किसी निमित्तसे उन्हीं नारायणके कृपाप्रसादसे मेरा जन्म हुआ है। तात! आप भी पूर्वसर्गमें उन्हीं भगवान्के क्रोधसे उत्पन्न हुए सनातन पुरुष हैं ॥ १२८ ॥ मया च सार्धं वरद विबुधैश्च महर्षिभिः । प्रसाद्याशु लोकानां शान्तिर्भवतु मा चिरम् ॥ १२९ ॥ 'वरद! आप देवताओं और महर्षियोंके तथा मेरे साथ शीघ्र इन भगवान्को प्रसन्न कीजिये, जिससे सम्पूर्ण जगत्में शीघ्र ही शान्ति स्थापित हो' ॥ १२९ ॥ ब्रह्मणा त्वेवमुक्तस्तु रुद्रः क्रोधाग्निमुत्सृजन् । प्रसादयामास ततो देवं नारायणं प्रभुम् । शरणं च जगामाद्यं वरेण्यं वरदं प्रभुम् ॥ १३० ॥ ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर रुद्रदेवने अपनी क्रोधाग्निका त्याग किया। फिर आदिदेव, वरेण्य, वरदायक, सर्वसमर्थ भगवान् नारायणको प्रसन्न किया और उनकी शरण ली ॥ १३० ॥ ततोऽथ वरदो देवो जितक्रोधो जितेन्द्रियः । प्रीतिमानभवत् तत्र रुद्रेण सह संगतः ॥ १३१ ॥ तब क्रोध और इन्द्रियोंको जीत लेनेवाले वरदायक देवता नारायण वहाँ बड़े प्रसन्न हुए और रुद्रदेवसे गले मिले ॥ १३१ ॥ ऋषिभिर्ब्रह्मणा चैव विबुधैश्च सुपूजितः । उवाच देवमीशानमीशः स जगतो हरिः ॥ १३२ ॥ यस्त्वां वेत्ति स मां वेत्ति यस्त्वामनु स मामनु । नावयोरन्तरं किंचिन्मा तेऽभूद् बुद्धिरन्यथा ॥ १३३ ॥ तदनन्तर देवताओं, ऋषियों और ब्रह्माजीसे अत्यन्त पूजित हो जगदीश्वर श्रीहरिने रुद्रदेवसे कहा—'प्रभो! जो तुम्हें जानता है, वह मुझे भी जानता है। जो तुम्हारा अनुगामी है, वह मेरा भी अनुगामी है। हम दोनोंमें कुछ भी अन्तर नहीं है। तुम्हारे मनमें इसके विपरीत विचार नहीं होना चाहिये ॥ १३२-१३३ ॥ अद्यप्रभृति श्रीवत्सः शूलाङ्को मे भवत्वयम् । मम पाण्यङ्कितश्चापि श्रीकण्ठस्त्वं भविष्यसि ॥ १३४ ॥ 'आजसे तुम्हारे शूलका यह चिह्न मेरे वक्षः-स्थलमें 'श्रीवत्स' के नामसे प्रसिद्ध होगा और तुम्हारे कण्ठमें मेरे हाथके चिह्नसे अंकित होनेके कारण तुम भी 'श्रीकण्ठ' कहलाओगे' ॥ १३४ ॥