महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2343, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंधनंजय! जिन्हें क्रोधज बताकर मैंने तुमसे बारंबार उनका परिचय दिया है और पहले तुमने जो कुछ सुन रक्खा है, वह सब उन रुद्रदेवका ही प्रभाव है ॥ १४२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
द्विचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं)
* सूर्य और चन्द्रमा ही अग्नि एवं सोम हैं। वे जगत्को हर्ष प्रदान करनेके कारण ‘हृषी’ कहलाते हैं। वे ही भगवान्के केश अर्थात् किरणें हैं, इसलिये भगवान्का नाम ‘हृषीकेश’ है।
* ‘कृष्ण’ नामकी दूसरी व्युत्पत्ति भी इस प्रकार है—कृष् नाम है सत्का और ण कहते हैं आनन्दको। इन दोनोंसे उपलक्षित सच्चिदानन्दघन श्यामसुन्दर गोलोकविहारी नन्दनन्दन श्रीकृष्ण कहलाते हैं।
* वेदमन्त्रके दो-दो पदका उच्चारण करके पहले-पहलेको छोड़ते जाना और उत्तरोत्तर पदको मिलाकर दो-दो पदोंका एक साथ पाठ करते रहना क्रमविभाग कहलाता है। जैसे—‘अग्निमीले पुरोहितम्’ इस मन्त्रका क्रमपाठ इस प्रकार है—‘अग्नि मीले ईले पुरोहितं पुरोहितं यज्ञस्य’ इत्यादि। अक्षरविभागका अर्थ है पदविभाग—एक-एक पदको अलग-अलग करके पढ़ना। यथा ‘अग्निम् ईले पुरोहितम्’ इत्यादि।