भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2354

तस्माच्चोत्तिष्ठते देवात् सर्वभूतहिताद् रसः । आपो हि तेन युज्यन्ते द्रवत्वं प्राप्नुवन्ति च ॥ ७ ॥ सम्पूर्ण प्राणियोंका हित चाहनेवाले उन नारायण-देवसे ही रस प्रकट हुआ है, जिसका जलके साथ संयोग है और जिसके कारण जल द्रवीभूत होता है ॥ ७ ॥

तस्मादेव समुद्भूतं तेजो रूपगुणात्मकम् । येन संयुज्यते सूर्यस्ततो लोके विराजते ॥ ८ ॥ उन्हींसे रूप-गुणविशिष्ट तेजका प्रादुर्भाव हुआ है, जिससे सूर्यदेव संयुक्त हुए हैं। इसीलिये वे लोकमें प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ८ ॥

तस्माद् देवात् समुद्भूतः स्पर्शस्तु पुरुषोत्तमात् । येन स्म युज्यते वायुस्ततो लोकान् विवात्यसौ ॥ ९ ॥ उन्हीं भगवान् पुरुषोत्तमसे स्पर्शकी उत्पत्ति हुई है, जिससे वायुदेव संयुक्त होते हैं और उससे संयुक्त होनेके कारण ही वे सम्पूर्ण लोकोंमें प्रवाहित होते हैं ॥ ९ ॥

तस्माच्चोत्तिष्ठते शब्दः सर्वलोकेश्वरात् प्रभोः । आकाशं युज्यते येन ततस्तिष्ठत्यसंवृतम् ॥ १० ॥ उन्हीं सर्वलोकेश्वर प्रभुसे शब्दका प्रादुर्भाव होता है, जिससे आकाशका नित्य संयोग है और जिसके ही कारण वह निरावृत रहता है ॥ १० ॥

तस्माच्चोत्तिष्ठते देवात् सर्वभूतगतं मनः । चन्द्रमा येन संयुक्तः प्रकाशगुणधारणः ॥ ११ ॥ उन्हीं नारायणदेवसे सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर रहनेवाले मनकी भी उत्पत्ति हुई है। उस मनसे संयुक्त होकर ही चन्द्रमा प्रकाश-गुणको धारण करता है ॥ ११ ॥

सद्भूतोत्पादकं नाम तत् स्थानं वेदसंज्ञितम् । विद्यासहायो यत्रास्ते भगवान् हव्यकव्यभुक् ॥ १२ ॥ जहाँ भगवान् श्रीहरि हव्य और कव्यका भोग ग्रहण करते हुए विद्याशक्तिके साथ विराजमान हैं, वह वेदसंज्ञक स्थान सद्भूतोत्पादक कहलाता है ॥ १२ ॥

ये हि निष्कलुषा लोके पुण्यपापविवर्जिताः । तेषां वै क्षेममध्वानं गच्छतां द्विजसत्तम ॥ १३ ॥ सर्वलोकतमोहन्ता आदित्यो द्वारमुच्यते । द्विजश्रेष्ठ! संसारमें जो लोग पुण्य और पापसे रहित एवं निर्मल हैं, वे कल्याणमय मार्गसे भगवद्धामको प्राप्त होते हैं, उस समय सम्पूर्ण लोकोंके अन्धकारका नाश करनेवाले भगवान् सूर्य ही उनके उस मोक्षधामका द्वार बताये जाते हैं ॥ १३ १/२ ॥

आदित्यदग्धसर्वाङ्गा अदृश्याः केनचित् क्वचित् ॥ १४ ॥ परमाणुभूता भूत्वा तु तं देवं प्रविशन्त्युत ।