महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2356, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वं हि नौ संविदितं त्रैलोक्ये सचराचरे ।
यद् भविष्यति वृत्तं वा वर्तते वा शुभाशुभम् ।
सर्वं स ते कथितवान् देवदेवो महामुने ॥ २४ ॥
द्विजोत्तम! हम दोनोंने पूर्ववत् अपने कर्ममें संलग्न हो सर्वोत्तम एवं सम्पूर्ण कठिनाइयोंसे युक्त उत्तम व्रतमें तत्पर रहते हुए ही श्वेतद्वीपमें उपस्थित होकर वहाँ तुम्हें देखा था। तपोधन! तुम वहाँ भगवान्से मिले और उनके साथ वार्तालाप किया। ये सारी बातें हम दोनोंको अच्छी तरह विदित हैं। महामुने! चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें जो शुभ या अशुभ बात हो चुकी है, हो रही है, अथवा होनेवाली है, वह सब उस समय देवदेव भगवान् श्रीहरिने तुमसे कही थी ॥ २२—२४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तयोर्वाक्यं तपस्युग्रे च वर्ततोः ।
नारदः प्राञ्जलिर्भूत्वा नारायणपरायणः ॥ २५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कठोर तपस्यामें लगे हुए भगवान् नर और नारायणकी यह बात सुनकर नारदजीने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और नारायणकी शरण लेकर उन्हींकी आराधनामें लग गये ॥ २५ ॥
जजाप विधिवन्मन्त्रान् नारायणगतान् बहून् ।
दिव्यं वर्षसहस्रं हि नरनारायणाश्रमे ॥ २६ ॥
उन्होंने नारायणसम्बन्धी बहुत-से मन्त्रोंका विधिपूर्वक जप किया और एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक वे नर-नारायणके आश्रममें टिके रहे ॥ २६ ॥
अवसत् स महातेजा नारदो भगवानृषिः ।
तमेवाभ्यर्चयन् देवं नरनारायणौ च तौ ॥ २७ ॥
महातेजस्वी भगवान् नारद मुनि प्रतिदिन उन्हीं भगवान् वासुदेवकी तथा उन दोनों नर और नारायणकी भी आराधना करते हुए वहाँ रहने लगे ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
चतुश्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४४ ॥