भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2358

यजामि वै पितॄन् साधो नारायणविधौ कृते । एवं स एव भगवान् पिता माता पितामहः ॥ ७ ॥ साधो! मैं पहले नारायणकी आराधनाका कार्य पूर्ण कर लेनेपर पितरोंका पूजन करता हूँ। इस प्रकार वे भगवान् नारायण ही मेरे पिता, माता और पितामह हैं ॥ ७ ॥ इज्यते पितृयज्ञेषु तथा नित्यं जगत्पतिः । श्रुतिश्चाप्यपरा देवी पुत्रान् हि पितरोऽयजन् ॥ ८ ॥ पितृयज्ञोंमें सदा श्रीहरिकी ही आराधना की जाती है। एक दूसरी श्रुति है कि पिताओं (देवताओं) नें पुत्रों (अग्निष्वात्त³ आदि) का पूजन किया ॥ ८ ॥ वेदश्रुतिः प्रणष्टा च पुनरध्यापिता सुतैः । ततस्ते मन्त्रदाः पुत्राः पितृत्वमुपपेदिरे ॥ ९ ॥ देवताओंका वेदज्ञान भूल गया था; फिर उनके पुत्रोंने ही उन्हें वेदश्रुतियोंको पढ़ाया। इसीसे वे मन्त्रदाता पुत्र पितृभावको प्राप्त हुए ॥ ९ ॥ नूनं पुरैतद् विदितं युवयोर्भावितात्मनोः । पुत्राश्च पितरश्चैव परस्परमपूजयन् ॥ १० ॥ पुत्रों और पिताओंने जो परस्पर एक-दूसरेका पूजन किया, यह बात आप दोनों शुद्धात्मा पुरुषोंको निश्चय ही पहलेसे ही ज्ञात रही होगी ॥ १० ॥ त्रीन् पिण्डान् न्यस्य वै पृथ्व्यां पूर्वं दत्त्वा कुशानिति । कथं तु पिण्डसंज्ञां ते पितरो लेभिरे पुरा ॥ ११ ॥ देवताओंने पृथ्वीपर पहले कुश बिछाकर उनपर पितरोंके निमित्त तीन पिण्ड रखकर जो उनका पूजन किया था, इसका क्या कारण है? पूर्वकालमें पितरोंने पिण्डनाम कैसे प्राप्त किया? ॥ ११ ॥

नरनारायणावूचतुः इमां हि धरणीं पूर्वं नष्टां सागरमेखलाम् । गोविन्द उज्जहाराशु वाराहं रूपमास्थितः ॥ १२ ॥ **नर-नारायण बोले—**मुने! यह समुद्रसे घिरी हुई पृथ्वी पहले एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो गयी थी। उस समय भगवान् गोविन्दने वराहरूप धारण करके शीघ्रतापूर्वक इसका उद्धार किया था ॥ १२ ॥ स्थापयित्वा तु धरणीं स्वे स्थाने पुरुषोत्तमः । जलकर्दमलिप्ताङ्गो लोककार्यार्थमुद्यतः ॥ १३ ॥ वे पुरुषोत्तम पृथ्वीको अपने स्थानपर स्थापित करके जल और कीचड़से लिपटे अंगोंसे ही लोकहितका कार्य करनेके लिये उद्यत हुए ॥ १३ ॥ प्राप्ते चाह्निककाले तु मध्यदेशगते रवौ ।