महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनृपश्रेष्ठ! ऐसी बातें कहते हुए ब्रह्माजीके मनमें भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करनेका विचार उत्पन्न हुआ। बुद्धिमानोंमें अग्रगण्य नरेश! तब भगवान् ब्रह्माने हाथ जोड़कर उत्तम एवं जपने योग्य स्तोत्रका गान आरम्भ किया ।। ३६-३७ ।।
ब्रह्मोवाच
ॐनमस्ते ब्रह्महृदय नमस्ते मम पूर्वज । लोकाद्य भुवनश्रेष्ठ सांख्ययोगनिधे प्रभो ।। ३८ ।। ब्रह्माजी बोले— प्रभो! वेद आपका हृदय है, आपको नमस्कार है। मेरे पूर्वज! आपको प्रणाम है। जगत्के आदि कारण! भुवनश्रेष्ठ! सांख्ययोगनिधे! प्रभो! आपको बारंबार नमस्कार है ।। ३८ ।। व्यक्ताव्यक्तकराचिन्त्य क्षेमं पन्थानमास्थित । विश्वभुक् सर्वभूतानामन्तरात्मन्नयोनिज । अहं प्रसादजस्तुभ्यं लोकधाम स्वयम्भुवः ।। ३९ ।। व्यक्त जगत् और अव्यक्त प्रकृतिको उत्पन्न करनेवाले परमात्मन्! आपका स्वरूप अचिन्त्य है। आप कल्याणमय मार्गमें स्थित हैं। विश्वपालक! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा, किसी योनिसे उत्पन्न न होनेवाले, जगत्के आधार और स्वयम्भू हैं। मैं आपकी कृपासे उत्पन्न हुआ हूँ ।। ३९ ।। त्वत्तो मे मानसं जन्म प्रथमं द्विजपूजितम् । चाक्षुषं वै द्वितीयं मे जन्म चासीत् पुरातनम् ।। ४० ।। आपसे मेरा प्रथम बार जो जन्म हुआ था, वह द्विजोंद्वारा सम्मानित मानस-जन्म कहा गया है अर्थात् प्रथम बार मैं आपके मनसे उत्पन्न हुआ। तदनन्तर पूर्वकालमें मैं आपके नेत्रसे उत्पन्न हुआ। वह मेरा दूसरा जन्म था ।। ४० ।। त्वत्प्रसादात् तु मे जन्म तृतीयं वाचिकं महत् । त्वत्तः श्रवणजं चापि चतुर्थं जन्म मे विभो ।। ४१ ।। तत्पश्चात् आपके कृपाप्रसादसे मेरा जो तीसरा महत्त्वपूर्ण जन्म हुआ, वह वाचिक था अर्थात् आपके वचनमात्रसे सुलभ हो गया था। विभो! उसके बाद आपके कानोंसे मेरा चतुर्थ जन्म हुआ था ।। ४१ ।। नासिक्यं चापि मे जन्म त्वत्तः परममुच्यते । अण्डजं चापि मे जन्म त्वत्तः षष्ठं विनिर्मितम् ।। ४२ ।। उसके बाद आपकी नासिकासे मेरा पाँचवाँ उत्तम जन्म बताया जाता है। तदनन्तर मैं आपके द्वारा ब्रह्माण्डसे उत्पन्न किया गया। वह मेरा छठा जन्म था ।। ४२ ।। इदं च सप्तमं जन्म पद्मजन्मेति वै प्रभो । सर्गे सर्गे ह्यहं पुत्रस्तव त्रिगुणवर्जित ।। ४३ ।।