भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2387

राजन्! इस प्रकार यह आदि एवं महान् धर्म सनातनकालसे चला आ रहा है। यह दूसरोंके लिये दुर्ज्ञेय और दुष्कर है। भगवान्‌के भक्त सदा ही इस धर्मको धारण करते हैं॥ ५५ ॥ धर्मज्ञानेन चैतेन सुप्रयुक्तेन कर्मणा । अहिंसाधर्मयुक्तेन प्रीयते हरिरीश्वरः ॥ ५६ ॥ इस धर्मको जाननेसे और अहिंसाभावसे युक्त इस सात्वतधर्मको क्रियारूपसे आचरणमें लानेसे जगदीश्वर श्रीहरि प्रसन्न होते हैं॥ ५६ ॥ एकव्यूहविभागो वा क्वचिद् द्विव्यूहसंज्ञितः । त्रिव्यूहश्चापि संख्यातश्चतुर्व्यूहश्च दृश्यते ॥ ५७ ॥ भगवान्‌के भक्तोंद्वारा कभी केवल एक व्यूह—भगवान् वासुदेवकी, कभी दो व्यूह—वासुदेव और संकर्षणकी, कभी प्रद्युम्नसहित तीन व्यूहोंकी और कभी अनिरुद्धसहित चार व्यूहोंकी उपासना देखी जाती है॥ हरिरेव हि क्षेत्रज्ञो निर्ममो निष्कलस्तथा । जीवश्च सर्वभूतेषु पञ्चभूतगुणातिगः ॥ ५८ ॥ भगवान् श्रीहरि ही क्षेत्रज्ञ हैं, ममतारहित और निष्कल हैं। ये ही सम्पूर्ण भूतोंमें पाञ्चभौतिक गुणोंसे अतीत जीवात्मारूपसे विराजमान हैं॥ ५८ ॥ मनश्च प्रथितं राजन् पञ्चेन्द्रियसमीरणम् । एष लोकविधिर्धीमानेष लोकविसर्गकृत् ॥ ५९ ॥ राजन्! पाँचों इन्द्रियोंका प्रेरक जो विख्यात मन है, वह भी श्रीहरि ही हैं। ये बुद्धिमान् श्रीहरि ही सम्पूर्ण जगत्‌के प्रेरक और स्रष्टा हैं॥ ५९ ॥ अकर्ता चैव कर्ता च कार्यं कारणमेव च । यथेच्छति तथा राजन् क्रीडते पुरुषोऽव्ययः ॥ ६० ॥ नरेश्वर! ये अविनाशी पुरुष नारायण ही अकर्ता, कर्ता, कार्य तथा कारण हैं। ये जैसा चाहते हैं, वैसे ही क्रीड़ा करते हैं ॥ ६० ॥ एष एकान्तधर्मस्ते कीर्तितो नृपसत्तम । मया गुरुप्रसादेन दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ॥ ६१ ॥ नृपश्रेष्ठ! यह मैंने तुमसे गुरुकृपासे ज्ञात हुए अनन्य भक्तिरूप धर्मका वर्णन किया है। जिनका अन्तःकरण पवित्र नहीं है, ऐसे लोगोंके लिये इस धर्मका ज्ञान होना बहुत ही कठिन है॥ ६१॥ एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा बहवो नृप । यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत् स्यात् कुरुनन्दन ॥ ६२ ॥ अहिंसकैरात्मविद्भिः सर्वभूतहिते रतैः । भवेत् कृतयुगप्राप्तिराशीःकर्मविवर्जिता ॥ ६३ ॥