महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ
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कृष्णत्रय (श्रीकृष्ण, अर्जुन और वेदव्यास) का स्तवन यज्ज्योतिस्तमसः परं महदहो निर्माय रूपाणि त- न्नामानि प्रविभज्य च व्यवहरत्येतैर्गुहायां गतम् । आनन्दैकरसं तदद्वयमथो तन्मायया देवकी- कुन्तीसत्यवतीषु जन्म धृतवत् कृष्णत्रयं पातु नः ॥
जो अज्ञानान्धकारसे परे, चिन्मय ज्योतिःस्वरूप तथा महद् ब्रह्मरूप हैं, जो अपने ही अनेक रूपोंका निर्माण करके उनके भिन्न-भिन्न नाम रखकर उन सबके द्वारा यथायोग्य व्यवहार करते हैं तथा जो 'अन्तर्यामी आत्मा' रूपसे सबकी हृदय-गुफामें स्थित, आनन्दैकरसस्वरूप और द्वैतरहित हैं; वे मायाद्वारा देवकी, कुन्ती तथा सत्यवतीके गर्भसे प्रकट हुए तीन कृष्ण (श्रीकृष्ण, अर्जुन और वेदव्यास) हमलोगोंकी रक्षा करें।