महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2402, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाञ्चरात्रविदो ये तु यथाक्रमपरा नृप । एकान्तभावोपगतास्ते हरिं प्रविशन्ति वै ॥ ७२ ॥ नरेश्वर! जो पाञ्चरात्रके ज्ञाता हैं और उसमें बताये हुए क्रमके अनुसार सेवापरायण हो अनन्यभावसे भगवान्की शरणमें प्राप्त हैं, वे उन भगवान् श्रीहरिमें ही प्रवेश करते हैं ॥ ७२ ॥
सांख्यं च योगं च सनातने द्वे वेदाश्च सर्वे निखिलेन राजन् । सर्वैः समस्तैर्ऋषिभिर्निरुक्तो नारायणो विश्वमिदं पुराणम् ॥ ७३ ॥ राजन्! सांख्य और योग—ये दो सनातन शास्त्र तथा सम्पूर्ण वेद सर्वथा यही कहते हैं और समस्त ऋषियोंने भी यही बताया है कि यह पुरातन विश्व भगवान् नारायण ही हैं ॥ ७२ ॥
शुभाशुभं कर्म समीरितं यत् प्रवर्तते सर्वलोकेषु किञ्चित् । तस्मादृषेस्तद्भवतीति विद्याद् दिव्यन्तरिक्षे भुवि चाप्सु चेति ॥ ७४ ॥ स्वर्ग, अन्तरिक्ष, भूतल और जल—इन सभी स्थानोंमें और सम्पूर्ण लोकोंमें जो कुछ भी शुभाशुभ कर्म होता बताया गया है, वह सब नारायणकी सत्तासे ही हो रहा है—ऐसा जानना चाहिये ॥ ७४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि द्वैपायनोत्पत्तौ एकोनपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें द्वैपायनकी उत्पत्तिविषयक तीन सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४९ ॥
* १. नारायण, २. ब्रह्मा, ३. वसिष्ठ, ४. शक्ति, ५. पराशर, ६. व्यास—इस प्रकार व्यासजी छठी पीढ़ीमें उत्पन्न हुए हैं।