महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयदि ब्रह्महत्या करनेवाला पुरुष कृच्छ्रव्रतके अनुसार भोजन करे तो छः वर्षोंमें वह शुद्ध हो जाता है और एक-एक मासमें एक-एक कृच्छ्रव्रतका निर्वाह करते हुए भोजन करे तो वह तीन ही वर्षोंमें पापमुक्त हो जाता है ।। संवत्सरेण मासाशी पूयते नात्र संशयः । तथैवोपवसन् राजन् स्वल्पेनापि प्रपूयते ।। ८ ।। यदि एक-एक मासपर भोजनक्रम बदलते हुए अत्यन्त तीव्र कृच्छ्रव्रतके अनुसार अन्न ग्रहण करे तो एक वर्षमें ही ब्रह्महत्यासे छुटकारा मिल सकता है३. इसमें संशय नहीं है। राजन्! इसी प्रकार यदि केवल उपवास करनेवाला मनुष्य हो तो उसकी स्वल्प समयमें ही शुद्धि हो जाती है ।। ८ ।। ऋतुना चाश्वमेधेन पूयते नात्र संशयः । ये चाप्यवभृथस्नाताः केचिदेवंविधा नराः ।। ९ ।। ते सर्वे धूतपाप्मानो भवन्तीति परा श्रुतिः । अश्वमेध यज्ञ करनेसे भी ब्रह्महत्याका पाप शुद्ध हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। जो इस प्रकारके लोग महायज्ञोंमें अवभृथ-स्नान करते हैं, वे सभी पापमुक्त हो जाते हैं—ऐसा श्रुतिका३ कथन है ।। ९ १/२ ।। ब्राह्मणार्थे हतो युद्धे मुच्यते ब्रह्महत्यया ।। १० ।। गवां शतसहस्रं तु पात्रेभ्यः प्रतिपादयेत् । ब्रह्महा विप्रमुच्येत सर्वपापेभ्य एव च ।। ११ ।। जो पुरुष ब्राह्मणके लिये युद्धमें प्राण दे देता है, वह भी ब्रह्महत्यासे छूट जाता है। ब्रह्महत्यारा होनेपर भी जो सुपात्र ब्राह्मणोंको एक लाख गौओंका दान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। १०-११ ।। कपिलानां सहस्राणि यो दद्यात् पञ्चविंशतिम् । दोग्ध्रीणां स च पापेभ्यः सर्वेभ्यो विप्रमुच्यते ।। १२ ।। जो दूध देनेवाली पचीस हजार कपिला गौओंका दान करता है, वह समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।। गोसहस्रं सवत्सानां दोग्ध्रीणां प्राणसंशये । साधुभ्यो वै दरिद्रेभ्यो दत्त्वा मुच्येत किल्बिषात् ।। १३ ।। जब मृत्युकाल निकट हो, उस समय सदाचारी दरिद्र ब्राह्मणोंको दूध देनेवाली एक हजार सवत्सा गौओंका दान करके भी मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो सकता है ।। १३ ।। शतं वै यस्तु काम्बोजान् ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति । नियतेभ्यो महीपाल स च पापात् प्रमुच्यते ।। १४ ।।