महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2436, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंभो भोः क्षाम्याभिभाषे त्वां न रोषं कर्तुमर्हसि ।
इह त्वमभिसम्प्राप्तः कस्यार्थे किं प्रयोजनम् ॥ ३ ॥
‘हे ब्राह्मणदेव! आप मेरे अपराधोंको क्षमा करें। मुझपर रोष न करें। मैं आपसे पूछता हूँ कि आप यहाँ किसके लिये आये हैं? आपका क्या प्रयोजन है? ॥ ३ ॥
आभिमुख्यादभिक्रम्य स्नेहात् पृच्छामि ते द्विज ।
विविक्ते गोमतीतीरे कं वा त्वं पर्युपाससे ॥ ४ ॥
‘ब्रह्मन्! मैं आपके सामने आकर प्रेमपूर्वक पूछता हूँ कि गोमतीके इस एकान्त तटपर आप किसकी उपासना करते हैं?’ ॥ ४ ॥
ब्राह्मण उवाच
धर्मारण्यं हि मां विद्धि नागं द्रष्टुमिहागतम् ।
पद्मनाभं द्विजश्रेष्ठ तत्र मे कार्यमाहितम् ॥ ५ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! आपको विदित हो कि मेरा नाम धर्मारण्य है। मैं नागराज पद्मनाभका दर्शन करनेके लिये यहाँ आया हूँ। उन्हींसे मुझे कुछ काम है ॥ ५ ॥
तस्य चाहमसांनिध्ये श्रुतवानस्मि तं गतम् ।
स्वजनात् तं प्रतीक्षामि पर्जन्यमिव कर्षकः ॥ ६ ॥
उनके स्वजनोंसे मैंने सुना है कि वे यहाँसे दूर गये हुए हैं, अतः जैसे किसान वर्षाकी राह देखता है, उसी तरह मैं भी उनकी बाट जोहता हूँ ॥ ६ ॥
तस्य चाक्लेशकरणं स्वस्तिकारसमाहितम् ।
आवर्तयामि तद् ब्रह्म योगयुक्तो निरामयः ॥ ७ ॥
उन्हें कोई क्लेश न हो। वे सकुशल घर लौटकर आ जायँ, इसके लिये नीरोग एवं योगयुक्त होकर मैं वेदोंका पारायण कर रहा हूँ ॥ ७ ॥
नाग उवाच
अहो कल्याणवृत्तस्त्वं साधुः सज्जनवत्सलः ।
अवाच्यस्त्वं महाभाग परं स्नेहेन पश्यसि ॥ ८ ॥
**नागने कहा—**महाभाग! आपका आचरण बड़ा ही कल्याणमय है। आप बड़े ही साधु हैं और सज्जनोंपर स्नेह रखते हैं। किसी भी दृष्टिसे आप निन्दनीय नहीं हैं; क्योंकि दूसरोंको स्नेहदृष्टिसे देखते हैं ॥ ८ ॥
अहं स नागो विप्रर्षे यथा मां विन्दते भवान् ।
आज्ञापय यथा स्वैरं किं करोमि प्रियं तव ॥ ९ ॥
ब्रह्मर्षे! मैं ही वह नाग हूँ, जिससे आप मिलना चाहते हैं। आप मुझे जैसा जानते हैं, मैं वैसा ही हूँ। इच्छानुसार आज्ञा दीजिये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? ॥ ९ ॥
भवन्तं स्वजनादस्मि सम्प्राप्तं श्रुतवानहम् ।