महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2442, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः
उञ्छ एवं शिलवृत्तिसे सिद्ध हुए पुरुषकी दिव्य गति
सूर्य उवाच
नैष देवोऽनिलसखो नासुरो न च पन्नगः ।
उञ्छवृत्तिव्रते सिद्धो मुनिरेष दिवं गतः ॥ १ ॥
**सूर्यदेवने कहा—**ये न तो वायुके सखा अग्निदेव थे, न कोई असुर थे और न नाग ही थे। ये उञ्छवृत्तिसे जीवननिर्वाहके व्रतका पालन करनेसे सिद्धिको प्राप्त हुए एक मुनि थे, जो दिव्यधाममें आ पहुँचे हैं ॥ १ ॥
एष मूलफलाहारः शीर्णपर्णाशनस्तथा ।
अब्भक्षो वायुभक्षश्च आसीद् विप्रः समाहितः ॥ २ ॥
ये ब्राह्मणदेवता फल-मूलका आहार करते, सूखे पत्ते चबाते अथवा पानी या हवा पीकर रह जाते थे और सदा एकाग्रचित्त होकर ध्यानमग्न रहते थे ॥ २ ॥
भवश्चानेन विप्रेण संहिताभिरभिष्टुतः ।
स्वर्गद्वारे कृतोद्योगो येनासौ त्रिदिवं गतः ॥ ३ ॥
इन श्रेष्ठ ब्राह्मणने संहिताके मन्त्रोंद्वारा भगवान् शंकरका स्तवन किया था। इन्होंने स्वर्गलोक पानेकी साधना की थी, इसलिये ये स्वर्गमें गये हैं ॥ ३ ॥
असङ्गतिरनाकाङ्क्षी नित्यमुञ्छशिलाशनः ।
सर्वभूतहिते युक्त एष विप्रो भुजङ्गम ॥ ४ ॥
नागराज! ये ब्राह्मण असंग रहकर लौकिक कामनाओंका त्याग कर चुके थे और सदा उञ्छ* एवं शिलवृत्तिसे प्राप्त हुए अन्नको ही खाते थे। ये निरन्तर समस्त प्राणियोंके हितसाधनमें संलग्न रहते थे ॥ ४ ॥
न हि देवा न गन्धर्वा नासुरा न च पन्नगाः ।
प्रभवन्तीह भूतानां प्राप्तानामुत्तमां गतिम् ॥ ५ ॥
ऐसे लोगोंको जो उत्तम गति प्राप्त होती है, उसे न देवता, न गन्धर्व, न असुर और न नाग ही पा सकते हैं ॥
एतदेवंविधं दृष्टमाश्चर्यं तत्र मे द्विज ।
संसिद्धो मानुषः कार्म योऽसौ सिद्धगतिं गतः ।
सूर्येण सहितो ब्रह्मन् पृथिवीं परिवर्तते ॥ ६ ॥
विप्रवर! सूर्यमण्डलमें मुझे यह ऐसा ही आश्चर्य दिखायी दिया था कि उञ्छवृत्तिसे सिद्ध हुआ वह मनुष्य इच्छानुसार सिद्ध-गतिको प्राप्त हुआ। ब्रह्मन्! अब वह सूर्यके साथ रहकर समूची पृथ्वीकी परिक्रमा करता है ॥ ६ ॥