भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 246

महापातकवर्जं तु प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ ४३ ॥ मैंने तुम्हारे सामने पापके अनुरूप प्रायश्चित्त बतलाया है, परंतु महापातकोंसे भिन्न पापोंके लिये ही ऐसा प्रायश्चित्त किया जाता है ॥ ४३ ॥

भक्ष्याभक्ष्येषु चान्येषु वाच्यावाच्ये तथैव च । अज्ञानज्ञानयो राजन् विहितान्यनुजानतः ॥ ४४ ॥ राजन्! भक्ष्य, अभक्ष्य, वाच्य और अवाच्य तथा जान-बूझकर और बिना जाने किये हुए पापोंके लिये ये प्रायश्चित्त कहे गये हैं। विज्ञ पुरुषको समझकर इनका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ४४ ॥

जानता तु कृतं पापं गुरु सर्वं भवत्युत । अज्ञानात् स्वल्पको दोषः प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ ४५ ॥ जान-बूझकर किया हुआ सारा पाप भारी होता है और अनजानमें वैसा पाप बन जानेपर कम दोष लगता है। इस प्रकार भारी और हलके पापके अनुसार ही उसके प्रायश्चित्तका विधान है ॥ ४५ ॥

शक्यते विधिना पापं यथोक्तेन व्यपोहितुम् । आस्तिके श्रद्दधाने च विधिरेष विधीयते ॥ ४६ ॥ शास्त्रोक्त विधिसे प्रायश्चित्त करके सारा पाप दूर किया जा सकता है। परंतु यह विधि आस्तिक और श्रद्धालु पुरुषके लिये ही कही गयी है ॥ ४६ ॥

नास्तिकाश्रद्दधानेषु पुरुषेषु कदाचन । दम्भद्वेषप्रधानेषु विधिरेष न दृश्यते ॥ ४७ ॥ जिनमें दम्भ और द्वेषकी प्रधानता है, उन नास्तिक और श्रद्धाहीन पुरुषोंके लिये कभी ऐसे प्रायश्चित्तका विधान नहीं देखा जाता है ॥ ४७ ॥

शिष्टाचारश्च शिष्टश्च धर्मो धर्मभृतां वर । सेवितव्यो नरव्याघ्र प्रेत्येह च सुखेप्सुना ॥ ४८ ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुरुषसिंह! जो इहलोक और परलोकमें सुख चाहता हो उसे श्रेष्ठ पुरुषोंके आचार तथा उनके उपदेश किये हुए धर्मका सदा ही सेवन करना चाहिये ॥ ४८ ॥

स राजन् मोक्ष्यसे पापात् तेन पूर्णेन हेतुना । प्राणार्थं वा धनेनैषामथवा नृपकर्मणा ॥ ४९ ॥ नरेश्वर! तुमने तो अपने प्राणोंकी रक्षा, धनकी प्राप्ति अथवा राजोचित कर्तव्यका पालन करनेके लिये ही शत्रुओंका वध किया है; अतः इतना ही पर्याप्त कारण है, जिससे तुम पापमुक्त हो जाओगे ॥ ४९ ॥

अथवा ते घृणा काचित् प्रायश्चित्तं चरिष्यसि । मा त्वेवानार्यजुष्टेन मन्युना निधनं गमः ॥ ५० ॥