महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 261, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हुए वे पाँचों भाई रथपर बैठकर मूर्तिमान् पाँच महाभूतोंके समान दिखायी देते थे ॥ ३७ ॥ आस्थाय तु रथं शुभ्रं युक्तमश्वैर्मनोजवैः । अन्वयात् पृष्ठतो राजन् युयुत्सुः पाण्डवाग्रजम् ॥ ३८ ॥ नरेश्वर! मनके समान वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए शुभ्र रथपर आरूढ़ हो युयुत्सु ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरके पीछे-पीछे चले ॥ ३८ ॥ रथं हेममयं शुभ्रं शैब्यसुग्रीवयोजितम् । सह सात्यकिना कृष्णः समास्थायान्वयात् कुरून् ॥ ३९ ॥ शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ोंसे जुते हुए सुन्दर सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो सात्यकिसहित श्रीकृष्ण भी कौरवोंके पीछे-पीछे गये ॥ ३९ ॥ नरयानेन तु ज्येष्ठः पिता पार्थस्य भारत । अग्रतो धर्मराजस्य गान्धारीसहितो ययौ ॥ ४० ॥ भरतनन्दन! कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिरके ज्येष्ठ पिता (ताऊ) गान्धारीसहित पालकीमें बैठकर उनके आगे-आगे जा रहे थे ॥ ४० ॥ कुरुस्त्रियश्च ताः सर्वाः कुन्ती कृष्णा तथैव च । यानैरुच्चावचैर्जग्मुर्विदुरेण पुरस्कृताः ॥ ४१ ॥ इन सबके पीछे कुन्ती और द्रौपदी आदि कुरुकुलकी वे सभी स्त्रियाँ यथायोग्य भिन्न-भिन्न सवारियोंपर चढ़कर चल रही थीं। इनके पीछे विदुरजी थे, जो इन सबकी देखभाल करते थे ॥ ४१ ॥ ततो रथाश्च बहुला नागाश्चाश्वसमलंकृताः । पादाताश्च हयाश्चैव पृष्ठतः समनुव्रजन् ॥ ४२ ॥ तदनन्तर इन सबके पीछे हाथी और घोड़ोंसे विभूषित बहुतसे रथी, पैदल और घुड़सवार सैनिक चल रहे थे ॥ ४२ ॥ ततो वैतालिकैः सूतैर्मागधैश्च सुभाषितैः । स्तूयमानो ययौ राजा नगरं नागसाह्वयम् ॥ ४३ ॥ इस प्रकार वैतालिकों, सूतों और मागधोंद्वारा सुन्दर वाणीमें अपनी स्तुति सुनते हुए राजा युधिष्ठिरने हस्तिनापुर नगरमें प्रवेश किया ॥ ४३ ॥ तत् प्रयाणं महाबाहोर्बभूवाप्रतिमं भुवि । आकुलाकुलमुत्कृष्टं हृष्टपुष्टजनाकुलम् ॥ ४४ ॥ महाबाहु युधिष्ठिरकी यह सामूहिक यात्रा (जुलूस) इस भूतलपर अनुपम थी। उसमें हृष्ट-पुष्ट मनुष्य भरे हुए थे। भीड़-पर-भीड़ बढ़ती चली जाती थी और बड़े जोरसे जयघोष एवं कोलाहल हो रहा था ॥ ४४ ॥ अभियाने तु पार्थस्य नरैर्नगरवासिभिः ।