महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 270, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंततो देवाः समेताश्च ब्रह्माणमिदमब्रुवन् । वधाय रक्षसस्तस्य बलविप्रकृतास्तदा ॥ ७ ॥ तब उसके बलसे तिरस्कृत हुए सब देवताओंने एकत्र हो ब्रह्माजीसे उसके वधके लिये प्रार्थना की ॥ ७ ॥ तानुवाच ततो देवो विहितस्तत्र वै मया । यथास्य भविता मृत्युरचिरेणेति भारत ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! तब ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा—'मैंने ऐसा विधान कर दिया है जिससे शीघ्र ही उस राक्षसकी मृत्यु हो जायगी ॥ ८ ॥ राजा दुर्योधनो नाम सखास्य भविता नृषु । तस्य स्नेहावबद्धोऽसौ ब्राह्मणानवमंस्यते ॥ ९ ॥ 'मनुष्योंमें राजा दुर्योधन उसका मित्र होगा और उसीके स्नेहसे बँधकर वह राक्षस ब्राह्मणोंका अपमान कर बैठेगा ॥ ९ ॥ तत्रैनं रुषिता विप्रा विप्रकारप्रधर्षिताः । धक्ष्यन्ति वाग्बलाः पापं ततो नाशं गमिष्यति ॥ १० ॥ 'उसके विरुद्धाचरणसे तिरस्कृत हो रोषमें भरे हुए वाक्शक्तिसे सम्पन्न ब्राह्मण वहीं उस पापीको जला देंगे। इससे उसका नाश हो जायगा' ॥ १० ॥ स एष निहतः शेते ब्रह्मदण्डेन राक्षसः । चार्वाको नृपतिश्रेष्ठ मा शुचो भरतर्षभ ॥ ११ ॥ नृपश्रेष्ठ! भरतभूषण! अब आप शोक न करें। यह वही राक्षस चार्वाक ब्रह्मदण्डसे मारा जाकर पृथ्वीपर पड़ा है ॥ ११ ॥ हतास्ते क्षत्रधर्मेण ज्ञातयस्तव पार्थिव । स्वर्गताश्च महात्मानो वीराः क्षत्रियपुङ्गवाः ॥ १२ ॥ राजन्! आपने क्षत्रियधर्मके अनुसार भाई-बन्धुओंका वध किया है। वे महामनस्वी क्षत्रियशिरोमणि वीर स्वर्गलोकमें चले गये हैं ॥ १२ ॥ स त्वमातिष्ठ कार्याणि मा तेऽभूद् ग्लानिरच्युत । शत्रून् जहि प्रजा रक्ष द्विजांश्च परिपूजय ॥ १३ ॥ अच्युत! अब आप अपने कर्तव्यका पालन करें। आपके मनमें ग्लानि न हो। आप शत्रुओंको मारिये, प्रजाकी रक्षा कीजिये और ब्राह्मणोंका आदर सत्कार करते रहिये ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि चार्वाकवरदानादिकथने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥