महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 276, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकचत्वारिंशोऽध्यायः
राजा युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रके अधीन रहकर राज्यकी व्यवस्थाके लिये भाइयों तथा अन्य लोगोंको विभिन्न कार्योंपर नियुक्त करना
वैशम्पायन उवाच
प्रकृतीनां च तद् वाक्यं देशकालोपबृंहितम् ।
श्रुत्वा युधिष्ठिरो राजा चोत्तरं प्रत्यभाषत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मन्त्री, प्रजा आदिके उस देशकालोचित वचनको सुनकर राजा युधिष्ठिरने उसका उत्तर देते हुए कहा— ॥ १ ॥
धन्याः पाण्डुसुता नूनं येषां ब्राह्मणपुङ्गवाः ।
तथ्यान् वाप्यथवातथ्यान् गुणानाहुः समागताः ॥ २ ॥
'निश्चय ही हम सभी पाण्डव धन्य हैं, जिनके गुणोंका बखान यहाँ पधारे हुए सभी ब्राह्मण कर रहे हैं। हममें वास्तवमें वे गुण हों या न हों, आपलोग हमें गुणवान् बता रहे हैं ॥ २ ॥
अनुग्राह्या वयं नूनं भवतामिति मे मतिः ।
यदेवं गुणसम्पन्नानस्मान् ब्रूथ विमत्सराः ॥ ३ ॥
'हमारा विश्वास है कि आपलोग निश्चय ही हमें अपने अनुग्रहका पात्र समझते हैं, तभी तो ईर्ष्या और द्वेष छोड़कर हमें इस प्रकार गुणसम्पन्न बता रहे हैं ॥
धृतराष्ट्रो महाराजः पिता मे दैवतं परम् ।
शासनेऽस्य प्रिये चैव स्थेयं मत्प्रियकांक्षिभिः ॥ ४ ॥
'महाराज धृतराष्ट्र मेरे पिता (ताऊ) और श्रेष्ठ देवता हैं। जो लोग मेरा प्रिय करना चाहते हों उन्हें सदा उनकी आज्ञाके पालन तथा हित-साधनमें लगे रहना चाहिये ॥
एतदर्थं हि जीवामि कृत्वा ज्ञातिवधं महत् ।
अस्य शुश्रूषणं कार्यं मया नित्यमतन्द्रिणा ॥ ५ ॥
'अपने भाई-बन्धुओंका इतना बड़ा संहार करके मैं इन्हीं महाराजके लिये जी रहा हूँ। मुझे नित्य-निरन्तर आलस्य छोड़कर इनकी सेवा-शुश्रूषामें संलग्न रहना है ॥ ५ ॥
यदि चाहमनुग्राह्यो भवतां सुहृदां तथा ।
धृतराष्ट्रे यथापूर्वं वृत्तिं वर्तितुमर्हथ ॥ ६ ॥
'यदि आप सब सुहृदोंका मुझपर अनुग्रह हो तो आपलोग महाराज धृतराष्ट्रके प्रति वैसा ही भाव और बर्ताव बनाये रखें, जैसा पहले रखते थे ॥ ६ ॥