महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 278, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसहदेवं समीपस्थं नित्यमेव समादिशत् । तेन गोप्यो हि नृपतिः सर्वावस्थो विशाम्पते ॥ १५ ॥ प्रजानाथ! सहदेवको राजा युधिष्ठिरने सदा ही अपने पास रहनेका आदेश दिया। उन्हें सभी अवस्थाओंमें राजाकी रक्षाका काम सौंपा गया था ॥ १५ ॥
यान् यानमन्यद् योग्यांश्च येषु येष्विह कर्मसु । तांस्तांस्तेष्वेव युयुजे प्रीयमाणो महीपतिः ॥ १६ ॥ प्रसन्न हुए महाराज युधिष्ठिरने जिन-जिन लोगोंको जिन-जिन कार्योंके योग्य समझा उन-उनको उन्हीं-उन्हीं कार्योंपर नियुक्त किया ॥ १६ ॥
विदुरं संजयं चैव युयुत्सुं च महामतिम् । अब्रवीत् परवीरघ्नो धर्मात्मा धर्मवत्सलः ॥ १७ ॥ उत्थायोत्थाय तत् कार्यमस्य राज्ञः पितुर्मम । सर्वं भवद्भिः कर्तव्यमप्रमत्तैर्यथायथम् ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले धर्मवत्सल धर्मात्मा युधिष्ठिरने विदुर, संजय तथा परम बुद्धिमान् युयुत्सुसे कहा—'आपलोगोंको सदा सावधान रहकर प्रतिदिन उठ-उठकर मेरे ताऊ महाराज धृतराष्ट्रकी सेवाका सारा आवश्यक कार्य यथोचितरूपसे सम्पन्न करना चाहिये ॥ १७-१८ ॥
पौरजानपदानां च यानि कार्याणि सर्वशः । राजानं समनुज्ञाप्य तानि कर्माणि भागशः ॥ १९ ॥ 'पुरवासियों और जनपदनिवासियोंके भी जो-जो कार्य हों, उन्हें इन्हीं महाराजकी आज्ञा लेकर पृथक्-पृथक् पूर्ण करना चाहिये' ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि भीमादिकर्मनियोगे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें भीमसेन आदिकी भिन्न-भिन्न कार्योंमें नियुक्तिविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥