महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयदि श्रोतुमिहार्हामि न रहस्यं च ते यदि । छिन्धि मे संशयं देव प्रपन्नायाभियाचते ॥ ७ ॥ देव! यदि मैं सुननेका अधिकारी होऊँ और यदि यह आपका कोई गोपनीय रहस्य न हो तो मेरे इस संशयका निवारण कीजिये; इसके लिये मैं आपकी शरणमें आकर बारंबार याचना करता हूँ ॥ ७ ॥
त्वं हि कर्ता विकर्ता च क्षरं चैवाक्षरं च हि । अनादिनिधनश्चाद्यस्त्वमेव पुरुषोत्तम ॥ ८ ॥ पुरुषोत्तम! आप ही इस जगत्को बनाने और विलीन करनेवाले हैं। आप ही क्षर और अक्षर पुरुष हैं। आपका न आदि है और न अन्त। आप ही सबके आदि कारण हैं ॥ ८ ॥
त्वत्प्रपन्नाय भक्ताय शिरसा प्रणताय च । ध्यानस्यास्य यथा तत्त्वं ब्रूहि धर्मभृतां वर ॥ ९ ॥ मैं आपकी शरणमें आया हुआ भक्त हूँ और माथा टेककर आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ प्रभो! इस ध्यानका यथार्थ तत्त्व मुझे बता दीजिये ॥
ततः स्वे गोचरे न्यस्य मनोबुद्धीन्द्रियाणि सः । स्मितपूर्वमुवाचेदं भगवान् वासवानुजः ॥ १० ॥ युधिष्ठिरकी यह प्रार्थना सुनकर मन, बुद्धि तथा इन्द्रियोंको अपने स्थानमें स्थापित करके इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए इस प्रकार बोले ॥ १० ॥