भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 297

रामस्य दयितं शिष्यं जामदग्न्यस्य पाण्डव । आधारं सर्वविद्यानां तमस्मि मनसा गतः ॥ १८ ॥ पाण्डुकुमार! जो जमदग्निनन्दन परशुरामजीके प्रिय शिष्य तथा सम्पूर्ण विद्याओंके आधार हैं, उन्हीं भीष्मजीका मैं मन-ही-मन चिन्तन करता था ॥ १८ ॥

स हि भूतं भविष्यच्च भवच्च भरतर्षभ । वेत्ति धर्मविदां श्रेष्ठं तमस्मि मनसा गतः ॥ १९ ॥ भरतश्रेष्ठ! वे भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंकी बातें जानते हैं। धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ उन्हीं भीष्मका मैं मन-ही-मन चिन्तन करने लगा था ॥ १९ ॥

तस्मिन् हि पुरुषव्याघ्रे कर्मभिः स्वैर्दिवं गते । भविष्यति मही पार्थ नष्टचन्द्रेव शर्वरी ॥ २० ॥ पार्थ! जब पुरुषसिंह भीष्म अपने कर्मोंके अनुसार स्वर्गलोकमें चले जायँगे, उस समय यह पृथ्वी अमावास्याकी रात्रिके समान श्रीहीन हो जायगी ॥ २० ॥

तद् युधिष्ठिर गाङ्गेयं भीष्मं भीमपराक्रमम् । अभिगम्योपसंगृह्य पृच्छ यत् ते मनोगतम् ॥ २१ ॥ अतः महाराज युधिष्ठिर! आप भयानक पराक्रमी गंगानन्दन भीष्मके पास चलकर उनके चरणोंमें प्रणाम कीजिये और आपके मनमें जो संदेह हो उसे पूछिये ॥ २१ ॥

चातुर्विद्यं चातुर्होत्रं चातुराश्रम्यमेव च । राजधर्मांश्च निखिलान् पृच्छैनं पृथिवीपते ॥ २२ ॥ पृथिवीनाथ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों विद्याओंको, होता, उद्गाता, ब्रह्मा और अध्वर्युसे सम्बन्ध रखनेवाले यज्ञादि कर्मोंको, चारों आश्रमोंके धर्मोंको तथा सम्पूर्ण राजधर्मोंको उनसे पूछिये ॥ २२ ॥

तस्मिन्नस्तमिते भीष्मे कौरवाणां धुरंधरे । ज्ञानान्यस्तं गमिष्यन्ति तस्मात् त्वां चोदयाम्यहम् ॥ २३ ॥ कौरववंशका भार सँभालनेवाले भीष्मरूपी सूर्य जब अस्त हो जायँगे, उस समय सब प्रकारके ज्ञानोंका प्रकाश नष्ट हो जायगा; इसलिये मैं आपको वहाँ चलनेके लिये कहता हूँ ॥ २३ ॥

तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य तथ्यं वचनमुत्तमम् । साश्रुकण्ठः स धर्मज्ञो जनार्दनमुवाच ह ॥ २४ ॥ भगवान् श्रीकृष्णका वह उत्तम और यथार्थ वचन सुनकर धर्मज्ञ युधिष्ठिरका गला भर आया और वे आँसू बहाते हुए वहाँ श्रीकृष्णसे कहने लगे— ॥ २४ ॥

यद् भवानाह भीष्मस्य प्रभावं प्रति माधव । तथा तन्नात्र संदेहो विद्यते मम माधव ॥ २५ ॥