भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 315

यश्च सर्वमयो नित्यं तस्मै सर्वात्मने नमः ॥ ८४ ॥ जिनके भीतर सब कुछ रहता है, जिनसे सब उत्पन्न होता है, जो स्वयं ही सर्वस्वरूप हैं, सदा ही सब ओर व्यापक हो रहे हैं और सर्वमय हैं, उन सर्वात्माको प्रणाम है ॥ ८४ ॥ विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव । अपवर्गोऽसि भूतानां पञ्चानां परतः स्थितः ॥ ८५ ॥ इस विश्वकी रचना करनेवाले परमेश्वर! आपको प्रणाम है। विश्वके आत्मा और विश्वकी उत्पत्तिके स्थानभूत जगदीश्वर! आपको नमस्कार है। आप पाँचों भूतोंसे परे हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंके मोक्षस्वरूप ब्रह्म हैं ॥ नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस्त्रिषु । नमस्ते दिक्षु सर्वासु त्वं हि सर्वमयो निधिः ॥ ८६ ॥ तीनों लोकोंमें व्याप्त हुए आपको नमस्कार है, त्रिभुवनसे परे रहनेवाले आपको प्रणाम है, सम्पूर्ण दिशाओंमें व्यापक आप प्रभुको नमस्कार है; क्योंकि आप सब पदार्थोंसे पूर्ण भण्डार हैं ॥ ८६ ॥ नमस्ते भगवन् विष्णो लोकानां प्रभवाप्यय । त्वं हि कर्ता हृषीकेश संहर्ता चापराजितः ॥ ८७ ॥ संसारकी उत्पत्ति करनेवाले अविनाशी भगवान् विष्णु! आपको नमस्कार है। हृषीकेश! आप सबके जन्मदाता और संहारकर्ता हैं। आप किसीसे पराजित नहीं होते ॥ ८७ ॥ न हि पश्यामि ते भावं दिव्यं हि त्रिषु वर्त्मसु । त्वां तु पश्यामि तत्त्वेन यत् ते रूपं सनातनम् ॥ ८८ ॥ मैं तीनों लोकोंमें आपके दिव्य जन्म-कर्मका रहस्य नहीं जान पाता; मैं तो तत्त्वदृष्टिसे आपका जो सनातन रूप है, उसीकी ओर लक्ष्य रखता हूँ ॥ ८८ ॥ दिवं ते शिरसा व्याप्तं पद्भ्यां देवी वसुन्धरा । विक्रमेण त्रयो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ॥ ८९ ॥ स्वर्गलोक आपके मस्तकसे, पृथ्वीदेवी आपके पैरोंसे और तीनों लोक आपके तीन पगोंसे व्याप्त हैं, आप सनातन पुरुष हैं ॥ ८९ ॥ दिशो भुजा रविश्चक्षुर्वीर्यं शुक्रः प्रतिष्ठितः । सप्त मार्गा निरुद्धास्ते वायोरमिततेजसः ॥ ९० ॥ दिशाएँ आपकी भुजाएँ, सूर्य आपके नेत्र और प्रजापति शुक्राचार्य आपके वीर्य हैं। आपने ही अत्यन्त तेजस्वी वायुके रूपमें ऊपरके सातों मार्गोंको रोक रखा है ॥ अतसीपुष्पसंकाशं पीतवाससमच्युतम् । ये नमस्यन्ति गोविन्दं न तेषां विद्यते भयम् ॥ ९१ ॥ जिनकी कान्ति अलसीके फूलकी तरह साँवली है, शरीरपर पीताम्बर शोभा देता है, जो अपने स्वरूपसे कभी च्युत नहीं होते, उन भगवान् गोविन्दको जो लोग नमस्कार करते हैं,