भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 326

ऋचीक उवाच नैष संकल्पितः कामो मया भद्रे तथा त्वयि । उग्रकर्मा समुत्पन्नश्चरुव्यत्यासहेतुना ॥ २३ ॥ **ऋचीक बोले—**कल्याणि! मैंने यह संकल्प नहीं किया था कि तुम्हारे गर्भसे ऐसा पुत्र उत्पन्न हो। परंतु चरु बदल जानेके कारण तुम्हें भयंकर कर्म करनेवाले पुत्रको जन्म देना पड़ रहा है ॥ २३ ॥

सत्यवत्युवाच इच्छँल्लोँकानपि मुने सृजेथाः किं पुनः सुतम् । शमात्मकमृजुं पुत्रं दातुमर्हसि मे प्रभो ॥ २४ ॥ **सत्यवती बोली—**मुने! आप चाहें तो सम्पूर्ण लोकोंकी नयी सृष्टि कर सकते हैं; फिर इच्छानुसार पुत्र उत्पन्न करनेकी तो बात ही क्या है? अतः प्रभो! मुझे तो शान्त एवं सरल स्वभाववाला पुत्र ही प्रदान कीजिये ॥ २४ ॥

ऋचीक उवाच नोक्तपूर्वानृतं भद्रे स्वैरेष्वपि कदाचन । किमुताग्निं समाधाय मन्त्रवच्चरुसाधने ॥ २५ ॥ **ऋचीक बोले—**भद्रे! मैंने कभी हास-परिहासमें भी झूठी बात नहीं कही है; फिर अग्निकी स्थापना करके मन्त्रयुक्त चरु तैयार करते समय मैंने जो संकल्प किया है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है? ॥ २५ ॥ दृष्टमेतत् पुरा भद्रे ज्ञातं च तपसा मया । ब्रह्मभूतं हि सकलं पितुस्तव कुलं भवेत् ॥ २६ ॥ कल्याणि! मैंने तपस्याद्वारा पहले ही यह बात देख और जान ली है कि तुम्हारे पिताका समस्त कुल ब्राह्मण होगा ॥ २६ ॥

सत्यवत्युवाच काममेवं भवेत् पौत्रो ममेह तव च प्रभो । शमात्मकमहं पुत्रं लभेयं जपतां वर ॥ २७ ॥ **सत्यवती बोली—**प्रभो! आप जप करनेवाले ब्राह्मणोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, आपका और मेरा पौत्र भले ही उग्र स्वभावका हो जाय; परंतु पुत्र तो मुझे शान्तस्वभावका ही मिलना चाहिये ॥ २७ ॥

ऋचीक उवाच पुत्रे नास्ति विशेषो मे पौत्रे च वरवर्णिनि । यथा त्वयोक्तं वचनं तथा भद्रे भविष्यति ॥ २८ ॥