महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 328, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंचक्रवर्ती महातेजा विप्राणामाश्वमेधिके ॥ ३६ ॥ ददौ स पृथिवीं सर्वां सप्तद्वीपां सपर्वताम् । स्वबाहुस्वबलेनाजौ जित्वा परमधर्मवित् ॥ ३७ ॥ दत्तात्रेयजीकी कृपासे राजा अर्जुनने एक हजार भुजाएँ प्राप्त की थीं। वह महातेजस्वी चक्रवर्ती नरेश था। उस परम धर्मज्ञ नरेशने अपने बाहुबलसे पर्वतों और द्वीपोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वीको युद्धमें जीतकर अश्वमेध यज्ञमें ब्राह्मणोंको दान कर दिया था ॥ ३६-३७ ॥
तृषितेन च कौन्तेय भिक्षितश्चित्रभानुना । सहस्रबाहुर्विक्रान्तः प्रादाद् भिक्षामथाग्नये ॥ ३८ ॥ कुन्तीनन्दन! एक समय भूखे-प्यासे हुए अग्निदेवने पराक्रमी सहस्रबाहु अर्जुनसे भिक्षा माँगी और अर्जुनने अग्निको वह भिक्षा दे दी ॥ ३८ ॥
ग्रामान् पुराणि राष्ट्राणि घोषांश्चैव तु वीर्यवान् । जज्वाल तस्य बाणाग्राच्चित्रभानुर्दिधक्षया ॥ ३९ ॥ तत्पश्चात् बलशाली अग्निदेव कार्तवीर्य अर्जुनके बाणोंके अग्रभागसे गाँवों, गोष्ठों, नगरों और राष्ट्रोंको भस्म कर डालनेकी इच्छासे प्रज्वलित हो उठे ॥ ३९ ॥
स तस्य पुरुषेन्द्रस्य प्रभावेण महौजसः । ददाह कार्तवीर्यस्य शैलानथ वनस्पतीन् ॥ ४० ॥ उन्होंने उस महापराक्रमी नरेश कार्तवीर्यके प्रभावसे पर्वतों और वनस्पतियोंको जलाना आरम्भ किया ॥ ४० ॥
स शून्यमाश्रमं रम्यमापवस्य महात्मनः । ददाह पवनेनेद्धश्चित्रभानुः सहैहयः ॥ ४१ ॥ हवाका सहारा पाकर उत्तरोत्तर प्रज्वलित होते हुए अग्निदेवने हैहयराजको साथ लेकर महात्मा आपवके सूने एवं सुरम्य आश्रमको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ४१ ॥
आपवस्तु ततो रोषाच्छापार्जुनमच्युत । दग्धेऽश्रमे महाबाहो कार्तवीर्येण वीर्यवान् ॥ ४२ ॥ महाबाहु अच्युत! कार्तवीर्यके द्वारा अपने आश्रमके जला दिये जानेपर शक्तिशाली आपव मुनिको बड़ा रोष हुआ। उन्होंने कृतवीर्यपुत्र अर्जुनको शाप देते हुए कहा — ॥ ४२ ॥
त्वया न वर्जितं यस्मान्ममेदं हि महत् वनम् । दग्धं तस्माद् रणे रामो बाहूंस्ते छेत्स्यतेऽर्जुन ॥ ४३ ॥ 'अर्जुन! तुमने मेरे इस विशाल वनको भी जलाये बिना नहीं छोड़ा, इसलिये संग्राममें तुम्हारी इन भुजाओंको परशुरामजी काट डालेंगे' ॥ ४३ ॥
अर्जुनस्तु महातेजा बली नित्यं शमात्मकः । ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च दाता शूरश्च भारत ॥ ४४ ॥