महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 34, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस तु राममुपागम्य शिरसाभिप्रणम्य च । ब्राह्मणो भार्गवोऽस्मीति गौरवेणाभ्यगच्छत ॥ १५ ॥ परशुरामजीके पास जाकर उसने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और 'मैं भृगुवंशी ब्राह्मण हूँ' ऐसा कहकर उसने गुरुभावसे उनकी शरण ली ॥ १५ ॥ रामस्तं प्रतिजग्राह पृष्ट्वा गोत्रादि सर्वशः । उष्यतां स्वागतं चेति प्रीतिमांश्चाभवद् भृशम् ॥ १६ ॥ परशुरामजीने गोत्र आदि सारी बातें पूछकर उसे शिष्यभावसे स्वीकार कर लिया और कहा—'वत्स! तुम यहाँ रहो। तुम्हारा स्वागत है।' ऐसा कहकर वे मुनि उसपर बहुत प्रसन्न हुए ॥ १६ ॥ तत्र कर्णस्य वसतो महेन्द्रे स्वर्गसंनिभे । गन्धर्वै राक्षसैैर्यक्षैर्देवैश्चासीत् समागमः ॥ १७ ॥ स्वर्गलोकके सदृश मनोहर उस महेन्द्र पर्वतपर रहते हुए कर्णको गन्धर्वों, राक्षसों, यक्षों तथा देवताओंसे मिलनेका अवसर प्राप्त होता रहता था ॥ १७ ॥ स तत्रेष्वस्त्रमकरोद् भृगुश्रेष्ठाद् यथाविधि । प्रियश्चाभवदत्यर्थं देवदानवरक्षसाम् ॥ १८ ॥ उस पर्वतपर भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीसे विधिपूर्वक धनुर्वेद सीखकर कर्ण उसका अभ्यास करने लगा। वह देवताओं, दानवों एवं राक्षसोंका अत्यन्त प्रिय हो गया ॥ १८ ॥ स कदाचित् समुद्रान्ते विचरन्नाश्रमान्तिके । एकः खड्गधनुष्पाणिः परिचक्राम सूर्यजः ॥ १९ ॥ एक दिनकी बात है, सूर्यपुत्र कर्ण हाथमें धनुष बाण और तलवार ले समुद्रके तटपर आश्रमके पास ही अकेला टहल रहा था ॥ १९ ॥ सोऽग्निहोत्रप्रसक्तस्य कस्यचिद् ब्रह्मवादिनः । जघानाज्ञानतः पार्थ होमधेनुं यदृच्छया ॥ २० ॥ पार्थ! उस समय अग्निहोत्रमें लगे हुए किसी वेदपाठी ब्राह्मणकी होमधेनु उधर आ निकली। उसने अनजानमें उस धेनुको (हिंस्र जीव समझकर) अकस्मात् मार डाला* ॥ २० ॥ तदज्ञानकृतं मत्वा ब्राह्मणाय न्यवेदयत् । कर्णः प्रसादयैंश्चैनमिदमित्यब्रवीद् वचः ॥ २१ ॥ अनजानमें यह अपराध बन गया है, ऐसा समझकर कर्णने ब्राह्मणको सारा हाल बता दिया और उसे प्रसन्न करते हुए इस प्रकार कहा— ॥ २१ ॥ अबुद्धिपूर्वं भगवन् धेनुरेषा हता तव । मया तत्र प्रसादं च कुरुष्वेति पुनः पुनः ॥ २२ ॥